फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

डॉ. नामवर सिंह के दिल में बसता था बनारस, अधूरी रह गई उनकी अंतिम इच्छा 

Fri, 22 Feb 2019 10:21 AM IST
Sayali Maurya न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
विज्ञापन
1 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
पथ में सांझ, पहाड़ियां ऊपर, पीछे अंके झरने का पुकारना। सीकरों की मेहराब की छांव में, छूटे हुए कुछ का ठुनकारना... ये कविता है डॉ. नामवर सिंह की। इस वक्त पूरा साहित्य जगत गमगीन है और रो रहा है। साहित्य जगत ने न सिर्फ एक अच्छा आलोचक खोया है बल्कि एक नेक दिल इंसान को भी खो दिया है। डॉ. नामवर सिंह की एक अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई और उसके पूरा होने से पहले ही वे दुनिया को अलविदा कह दिए। देखें आगे की स्लाइड्स में...
विज्ञापन

2 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
डॉ. नामवर सिंह पान को बाबा काशी विश्वनाथ का आशीर्वाद और प्रसाद मानते थे, इसी वजह से वो सदैव पान खाते थे और साथ रखते थे। साफ कहते थे कि पान काशी की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। डॉ. नामवर सिंह ने जीवन पर्यंत काशी और पूर्वांचल की संस्कृति को जिया और इससे खुद को कभी अलग नहीं होने दिया। काशी और चंदौली की मिट्टी को उन्होंने सदैव मां का दर्जा दिया। 
विज्ञापन

3 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
डॉ. नामवर सिंह कहते थे कि जो कुछ भी हूं अपनी माटी से मिले ज्ञान और अपने पुरखों के नेक कर्मों की बदौलत हूं। हाल ही में एक टीवी समाचार चैनल से बातचीत में डॉ. नामवर सिंह ने कहा था कि अंतिम इच्छा है कि एक बार फिर काशी जाऊं। जीवन के विविध रंगों, प्रगति के नए आयामों को महसूस करना चाहता हूं। अपने लोगों को देखना और उनसे रूबरू होना चाहता हूं। लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। 

4 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
डॉ. नामवर सिंह धानापुर ब्लाक के जीयनपुर गांव के निवासी थे। नागर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे बड़े डॉ. नामवर सिंह की प्राथमिक शिक्षा कमालपुर में हुई। इसके बाद उच्च शिक्षा बीएचयू से ली। नामवर सिंह, रामजी सिंह और काशीनाथ सिंह तीनों बाहर रहने लगे लेकिन तीनों का गांव वालों से जुड़ाव हमेशा रहा। घर की देखभाल करने वाले 70 वर्षीय जामवंत राजभर ने कहा कि नामवर के पिता नागर सिंह ने बचपन से उन्हें रखा था और सभी भाइयों ने भी उन्हें भाई जैसा प्यार दिया। कहा कि प्रत्येक दशहरा पर तीनों लोग घर आते और डॉ. नामवर सिंह सभी बच्चों को लेकर कमालपुर मेला देखने जाते। 
विज्ञापन

5 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
बड़े आदमी होने के बाद भी उनको गुमान नहीं था। वह आते तो गांव वाले सिर्फ उनकी बातें सुनने आते। तीनों भाई एक साथ बैठते तो नामवर कम बोलते लेकिन उनकी छोटी बात का भी बड़ा अर्थ होता था। उनका भतीजा लाल बहादुर कहते हैं कि बचपन में वह साथ खेलते थे। वे जितना तेज पढ़ाई में थे, उतने ही शातिर कबड्डी, कौड़िया मिसाल खेल में थे। उनसे जीतना मुश्किल था। वे हमारे कक्का थे लेकिन बच्चों के साथ वे बच्चे बन जाते थे। भतीजा महातिम ने कहा कि वह गांव में बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए चिंतित रहते थे। 
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
namvar singh - फोटो : amar ujala
बचपन में नामवर के मझले भाई रामजी सिंह की पढ़ाई पिता ने रोक दी। वह खेती पर ध्यान देने की बात कह रहे थे लेकिन नामवर पढ़ाई छूटने की बात सुनते ही रूठ कर घर से बाहर जाकर बैठ गए। दुबारा पढ़ाई शुरू करने की बात पर ही वह माने। वंश नरायन सिंह ने कहा कि वह भले ही कम्युनिस्ट विचारधारा के थे लेकिन सभी धर्मों का सम्मान करते थे। एक बार गांव वालों ने शिव मंदिर बनवाने के लिए चंदा मांगा तो उन्होंने कहा कि मंदिर के बजाय स्वास्थ्य केंद्र बनना चाहिए। गांव वालों को बात अच्छी लगी लेकिन जब वे मंदिर की बात पर अड़ गए तो नामवर से शिव मंदिर की छत के लिए पैसा दिया।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें