पथ में सांझ, पहाड़ियां ऊपर, पीछे अंके झरने का पुकारना। सीकरों की मेहराब की छांव में, छूटे हुए कुछ का ठुनकारना... ये कविता है डॉ. नामवर सिंह की। इस वक्त पूरा साहित्य जगत गमगीन है और रो रहा है। साहित्य जगत ने न सिर्फ एक अच्छा आलोचक खोया है बल्कि एक नेक दिल इंसान को भी खो दिया है। डॉ. नामवर सिंह की एक अंतिम इच्छा अधूरी ही रह गई और उसके पूरा होने से पहले ही वे दुनिया को अलविदा कह दिए। देखें आगे की स्लाइड्स में...