काशी में देवों की दीपावली शुक्रवार को धूमधाम से मनाई जा रही है। शाम से ही गंगा घाटों पर दीपों का चंद्रहार दिख रहा है। घाटों की इस अलौकिक छटा को देखने के लिए देश विदेश से लोगों आए हुए हैं। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
कहीं सुरों की खनक तो कहीं पटाखों की धमक सनाई दे रही है। घाट से लेकर गंगा की लहरों तक फूलों की महक के साथ इंद्रधनुषी अलौकिक छठा देखने को मिल रही है। मानो आकाश के सितारे धरा पर उतर आए हों। 21 लाख दीपों से घाट जगमगा रहे हैं।
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पूर्णिमा की शाम जैसे जैसे गहरा रही है बनारस के सभी 84 घाटों सहित 36 कुंडों की रौनक देखते बन रही है। काशी में सिर्फ घाट ही नहीं बल्कि मकानों, दुकानों और सड़कों पर भी लोग दीप जलाकर देवी देवताओं का स्वागत कर रहे हैं। शाम के साथ साथ ही यहां का नजारा अलौकिक होने लगा है।
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देव दीपावली को भव्य और ऐतिहासिक बनाने के लिए इस बार घाटों पर विशेष आयोजन किए जा रहे हैं। राजघाट से अस्सी के बीच दीपों की जगमगाहट के साथ ही काशी की धर्म, कला और संस्कृति भी झलक भी देखने को मिल रही है। इसके लिए संस्कृति विभाग और पर्यटन विभाग ने खास तैयारियां की हैं।
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16 घाटों पर संस्कृति विभाग की ओर से एकल और समूह नृत्य का आयोजन किया जा रहा है। इस बार सबसे खास बात यह है प्रशासन गंगा के दूसरी तरफ भी दीप दीपावली का आयोजन कर रहा है। प्रदेश के अलग अलग शहरों से जुड़ी पंरपंराओं से जुड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ ही काशी के नृत्य और संगीत की झलक दिखाई दे रही है।
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काशी में देव दीपावली की शुरुआत पुरातन काल से मानी जाती है। देव दीपावली का उल्लेख निर्णय सिंधु और स्मृति कौस्तुभी में भी है। संतों-विद्वानों के कथनानुसार काशी के प्रथम शासक दिवोदास ने राज्य में देवी-देवताओं का प्रवेश बंद कर दिया था। छिपे रूप में देवगण कार्तिक मास में पंचगंगा घाट पर गंगा में स्नान के लिए आते थे। बाद में यह प्रतिबंध हट गया।
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इसे हर्षोल्लास से मनाने के लिए सभी देवी-देवता बनारस में दीपमालाओं से सुसज्जित भगवान शिव की महाआरती के लिए कार्तिक पूर्णिमा के दिन पधारे थे। मान्यता है कि तभी से देव दीपावली मनाई जाने लगी। वहीं दूसरी मान्यता के अनुसार त्रिपुर नामक दैत्य पर विजय के पश्चात देवताओं ने कार्तिक पूर्णिमा के दिन अपने सेनापति कार्तिकेय के साथ शंकर की महाआरती और नगर को दीपमालाओं से सजाकर विजय दिवस मनाया था।
1986 में पूर्व काशी नरेश स्व. डॉ. विभूति नारायण सिंह ने पंचगंगा पर हजारा दीप जलाकर देव दीपावली की शुरुआत कराई थी। प्राचीन दशाश्वमेध घाट पर सबसे पहले आरती की शुरुआत 1991 से हुई है। 14 नवंबर, 1997 से गंगा आरती प्रतिदिन की जाने लगी।