किला परीक्षितगढ़ से एक किमी दूर है श्रृंगी ऋषि का आश्रम। वृक्षों से आच्छादित इस स्थल का नैसर्गिक सौंदर्य निरखते बनता है। इनमें एक संबल का प्राचीन वृक्ष भी है जिसके बारे में लोग कहते हैं, इसके नीचे शमीक ऋषि तपस्या में लीन थे।
जब राजा परीक्षित ने उनके गले में सर्प डाला। इस कथा को यहां मूर्तवान भी किया गया है। बाईं ओर एक ताल है। पं. हरिशंकर शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘इतिहास पुण्य पुरातन किला परीक्षितगढ़’ में इसे कौशिकी नदी का अवशेष कहा है।