जे बीमारी ने तो हमसे म्हारा काम, सुख चैन, पैसा सब छीन लिया जी। सरकार कह रही घर में रहो, लेकिन हम कैसे भीतर रहें। हम किसके धोरै जाएं, मजदूरी करके गुजारा करै हैं, लेकिन बंदी के मारे मजदूरी भी छूट गई। 400 की दिहाड़ी पर मजदूरी करके आठ सदस्यों वाले परिवार का पेट पाल रहे हरपाल आंखों में आंसू लिए यही कहते हैं।