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एक्सक्लूसिव: यहां दशकों से चल रहा नकली पेट्रोल-डीजल का काला कारोबार, अमर उजाला ने कई बार किया खुलासा

Fri, 23 Aug 2019 04:04 PM IST
कपिल kapil अनुज मित्तल, अमर उजाला, मेरठ
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पेट्रोल पंप को सील करते पुलिस अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
यूपी के मेरठ जिले में मिलावटी और नकली पेट्रोल-डीजल का काला कारोबार शहर के दो सफेदपोश पीढ़ी-दर-पीढ़ी कई दशकों से करते आ रहे हैं। अमर उजाला ने भी इस खेल का स्टिंग के जरिये कई बार खुलासा किया। लेकिन इन सफेदपोशों की सरकारी तंत्र में इतनी गहरी पैठ है कि कभी इनका कुछ नहीं बिगड़ा। साठगांठ में यह धंधा बढ़ता ही गया।
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पेट्रोल पंप पर जांच करते अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
नकली व मिलावटी पेट्रोल-डीजल का धंधा करीब तीन दशक से हो रहा है। शहर के बड़े तेल माफिया इसके सरगना हैं। इनकी शह पर कुछ अन्य लोगों ने भी हाथ आजमाने शुरू किए। पेट्रोल बनाने का तरीका तो साल्वेंट के साथ पुराना है, लेकिन डीजल बनाने के तरीके में बदलाव आया है। पहले डीजल केरोसिन ऑयल से बनता था। क्योंकि सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों पर कंट्रोल रेट पर बिकने वाले इस तेल में बड़ा खेल था। यही तेल माफिया केरोसिन के भी वितरक थे। आपूर्ति विभाग के साथ प्रशासनिक अधिकारियों की साठगांठ से गरीबों तक साल में छह माह ही केरोसिन मिलता था। आधा तेल नकली डीजल बनाने में प्रयोग हो जाता था। लेकिन बदली सरकारी नीति के बाद केरोसिन की आपूर्ति में काफी कमी आ गई और भविष्य में और भी आने वाली है। लेकिन आज भी जिले में 4.60 लाख लीटर केरोसिन हर माह आता है। लेकिन इसका 70 प्रतिशत ही सरकारी सस्ते गल्ले को आवंटित होता है। बाकी 30 प्रतिशत गायब कर दिया जाता है। केरोसिन जो सरकारी रेट पर करीब 32 रुपये प्रति लीटर मिलता है उसे व अन्य क्रूड आयल से डीजल बनता है।

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नकली पेट्रोल-डीजल - फोटो : अमर उजाला
पेट्रोल 50, डीजल 35 रुपये में तैयार 
तेल माफिया और पेट्रोल पंप संचालकों को नकली तेल के धंधे में मोटी बचत है। नकली पेट्रोल 50-52 रुपये प्रति लीटर में तैयार कर माफिया इसे पेट्रोल पंप संचालक को 55-58 रुपये प्रति लीटर देता है। पेट्रोल पंप पर यह तेल वर्तमान दर (71 रुपये से ज्यादा) पर बिकता है। डीजल भी करीब 35 रुपये लीटर में तैयार होता है। जिसे माफिया 38-40 रुपये लीटर तक पेट्रोल पंप पर देते हैं। यही डीजल वर्तमान दर पर 65 रुपये से अधिक पर बिकता है।

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नकली पेट्रोल-डीजल - फोटो : अमर उजाला
कांडला बंदरगाह पर सेटिंग
गुजरात के कांडला बंदरगाह पर आयात होकर क्रूड ऑयल आता है। यह तेल सस्ता होता और इसमें केमिकल मिलाकर डीजल आसानी से तैयार हो जाता है। तेल माफियाओं ने यहां से इसके टैंकर मंगाने की पूरी सेटिंग की हुई है।

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पेट्रोल पंप पर जांच करते अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
...सत्ता के गलियारे तक मजबूत पकड़
शहर में दो बड़े तेल माफियाओं की आला अधिकारियों से सत्ता के गलियारे तक पकड़ किसी से छिपी नहीं है। शासन में हर विभाग में तमाम ऐसे बड़े अधिकारी इनके खास होने के साथ इनके काले कारोबार को पूरा संरक्षण देते हैं। वहीं, सरकार चाहे किसी की रहे, इन्हीं अधिकारियों के बूते यह हर सरकार में सत्ता में पकड़ बना लेते हैं। इन तेल माफियाओं के निजी कार्यक्रमों में ये आला अधिकारी और नेता अक्सर देखे जा सकते हैं।
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पेट्रोल पंप पर जांच करते अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
ई-वे बिल को बना रहे माध्यम
तेल माफियाओं की हर जगह सेटिंग है। जीएसटी में ईवे बिल की व्यवस्था है। जिसमें ट्रांसपोर्टर को टैंकर जाने की दूरी भी दर्शानी होती है। जैसे तेल माफिया ईवे बिल मुरादाबाद का तैयार कराते हैं और टैंकर में नकली तेल भरकर उसे गजरौला आदि के पेट्रोल पंपों पर सप्लाई कर देते हैं। तीन दिन तक यह ईवे बिल काम करने की आड़ में ये एक ईवे बिल के माध्यम से 3-4 चक्कर लगाते हैं। इसके बाद मुरादाबाद जाकर वहां से वाहनों के इंजन से निकला खराब काला तेल टैंकर में भरकर उसे हरियाणा के रिफाइनरी प्लांट में देते हैं। काले तेल की सप्लाई की आड़ में नकली तेल धड़ल्ले से सप्लाई होता है।

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पेट्रोल पंप पर जांच करते अधिकारी - फोटो : अमर उजाला
कई पहलू उजागर हुए
नकली तेल के कारोबार से जुड़े रहे एक पुराने व्यक्ति ने इस खेल के कई पहलू उजागर किए। उसके अनुसार ये नकली तेल एक नई तेल कंपनी के पेट्रोल पंपों पर ज्यादा खपाया जा रहा है। बड़ी तेल कंपनियां अपनी लैब में समय-समय पर तेल की जांच करती हैं। इनके अधिकारियों से सेटिंग आसान न होने पर इन कंपनियों के मात्र 10 प्रतिशत पेट्रोल पंपों पर ही ये नकली तेल खपाया जाता है। जबकि एक अन्य कंपनी के पेट्रोल पंपों पर इसकी 90 प्रतिशत तक खपत हो रही है। क्योंकि इस कंपनी के पास अपनी लैब नहीं है। ऐसे में सिर्फ आपूर्ति विभाग से साठगांठ कर इस पूरे खेल को तेल माफिया आसानी से अंजाम देते हैं। कुछ माफियाओं ने तो पेट्रोल पंप ठेके पर लिए हुए हैं, जिन्हें वह नकली तेल के सहारे मोटी कमाई का माध्यम बनाए हुए हैं। वहीं, नकली पेट्रोल-डीजल की शिकायतें आपूर्ति विभाग द्वारा साठगांठ से दबा दी जाती हैं।
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नकली पेट्रोल-डीजल का मामला - फोटो : अमर उजाला
आपूर्ति विभाग की भूमिका संदिग्ध  
पेट्रोल पंपों पर नकली तेल धड़ल्ले से बिकता रहा और जिला आपूर्ति विभाग सोता रहा। भंडाफोड़ होने के बावजूद भी विभाग ने थिनर और सॉल्वेंट के लाइसेंस की जांच ठीक से नहीं कराई। पुलिस द्वारा लगाई सील भी सात घंटे बाद ही खुलवाने पर आपूर्ति विभाग की भूमिका संदिग्ध बनी है। व्यापारी राजीव जैन व प्रदीप गुप्ता ने अपनी केमिकल फैक्टरियों पर छापे के दौरान थिनर और सॉल्वेंट के लाइसेंस दिखाए थे। इसी से नकली तेल बनाने का दावा किया था। ये नकली तेल टैंकरों में भरकर पेट्रोल पंपों पर सप्लाई हो रहा था। सवाल है कि जिला आपूर्ति विभाग कहां सोया था। इतनी भारी मात्रा में नकली तेल सप्लाई होता रहा और विभाग को भनक भी नहीं लगी। पुलिस ने पर्दाफाश किया तो आपूर्ति विभाग की पोल खुल गई। नकली तेल बेचने वाले तीन पेट्रोल पंपों पर सील लगा दी। लेकिन आपूर्ति विभाग ने पुलिस अधिकारियों को बिना जानकारी दिए सील खोलकर सैंपल ले लिए।

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