आदिवासियों सा हो गया जीवन
बिहार प्रांत के औरंगाबाद जिला स्थित दाऊद नगर निवासी सोहराई प्रसाद, कमली देवी, मिथलेश कुमार और संजू देवी सहित लगभग दो दर्जन परिवारों के लोग महीने भर से कौशाम्बी में टिके हुए थे। ये परिवार सहित यहां रहकर मंझनपुर इलाके के समदा गांव से अर्का जाने वाली सड़क की पटरी बनाने का काम करते थे। कामगारों ने बताया कि सार्वजनिक लोक निर्माण विभाग का ठेकेदार न तो रहने की जगह दे रहा है न खाने को भोजन। उसने फोन भी उठाना बंद कर दिया है।
इस वजह से इन कामगारों के सामने दो जून की रोटी के लाले पड़ गए हैं। लॉक डाउन के बाद दो दिनों तक तो किसी तरह काम चलाया। अब खुद के साथ बच्चों का पेट भरने के लिए लोगों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हो गए हैं। बताया कि किसी रोज कोई रहम नहीं करता तो खेतों से सब्जी तोड़ ले आते हैं। इसी को किसी तरह भूंजकर खा लेते हैं। यूं समझें कि जीवन आदिवासियों सरीखा हो गया है।