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Sewage Treatment Plant: अपार्टमेंट, कॉलोनियों में लगेंगे छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, गंगा इनोवेशन रिसर्च पार्क में पायलट प्रोजेक्ट शुरू

Tue, 07 Jun 2022 10:41 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

इन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से न केवल गंगा का कायाकल्प होगा, बल्कि सिंचाई योग्य पानी भी मिलेगा। जाजमऊ सीटीपी में बने सी गंगा इनोवेशन रिसर्च पार्क में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो गया है। यहां आईआईटी और एनएमसीजी मिलकर तीन तकनीकों पर शोध कर रहे हैं। 
 
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श्री गंगा इनोवेशन रिसर्च पार्क का उद्घाटन - फोटो : अमर उजाला
कानपुर में सीवेज के पानी को सिंचाई योग्य बनाने के लिए अपार्टमेंट, कॉलोनियों और गांवों में छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए जाएंगे। प्लांट में गंदे पानी को शोधित किया जाएगा, फिर इस्तेमाल में लाया जाएगा। इससे न सिर्फ पानी की बर्बादी रुकेगी, बल्कि नदियों में गंदा पानी नहीं जा पाएगा।

केंद्र सरकार ने गंगा व अन्य सहायक नदियों में सीवेज को जाने से रोकने के लिए अपार्टमेंट, कालोनियों, गांवों में प्राइमरी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने की योजना बनाई है। इसे मूर्तरूप देने के लिए सोमवार को नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) के डायरेक्टर जनरल जी अशोक कुमार ने जाजमऊ सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (सीटीपी) परिसर में नवनिर्मित सी गंगा इनोवेशन रिसर्च पार्क में पायलट प्रोजेक्ट का शुभारंभ किया। 

पार्क में तीन तकनीकों पर शोध होगा, इनमें से एक आईआईटी कानपुर की, दूसरी बेल्जियम और तीसरी इटली की तकनीक है। आईआईटी ने ही यह पार्क बनाया है। आईआईटी के सेंटर फॉर गंगा रिवर बेसिन मैनेजमेंट एंड स्टडी के संस्थापक व आईआईटी के प्रोफेसर विनोद तारे की देखरेख में इस पार्क में तीन तकनीकों पर शोध शुरू किए गए हैं। 
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अपार्टमेंट, कॉलोनियों में लगेंगे छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट - फोटो : सोशल मीडिया
प्रोफेसर तारे ने बताया कि तीनों तकनीक से रोज सीवेज ट्रीट किया जाएगा। इसके बाद एनालिसिस रिपोर्ट के आधार पर इस तकनीक का असर देखा जाएगा। अधिकारियों ने बताया कि इन तीनों तकनीक में जो तकनीक श्रेष्ठ सिद्ध होगी, उसका उपयोग इन छोटे सीटीपी में किया जाएगा। शुभारंभ के दौरान जल निगम के महाप्रबंधक एसके शर्मा, गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई के प्रोजेक्ट मैनेजर ज्ञानेंद्र चौधरी आदि मौजूद रहे। 
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सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट - फोटो : सोशल मीडिया
इसलिए पड़ी जरूरत 
शहर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों में जो सीवेज पहुंच रहा है, उसमें रसायनों की भी कुछ मात्रा रहती है। इस कारण शोधित करते समय जो सिल्ट बचती है, उसमें भी केमिकल बच जाते हैं। ऐसे में सिल्ट का खेतों में जैविक खाद के रूप में उपयोग नहीं हो पाता है। रसायन होने के कारण किसान भी सिंचाई के लिए शोधित सीवेज के पानी का उपयोग करने में हिचकिचाते हैं। अब पहले प्राथमिक ट्रीटमेंट प्लांटों में शोधन होगा, इसके बाद बाद जाजमऊ स्थित कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) में फिर से पानी का शोधन होगा। जल निगम के मुख्य अभियंता आरके शर्मा ने बताया कि टेनरियों में लगे प्राइमरी ट्रीटमेंट प्लांट से सीईटीपी में पहुंच रहे टेनरी वेस्ट में क्रोमियम की मात्रा कम हो जाती है।

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कानपुर मेट्रो डिपो - फोटो : सोशल मीडिया
मेट्रो डिपो में लगा छोटा सीटीपी 
उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉरपोरेशन के डिपो में छोटा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा है। इस प्लांट में शोधित हुए पानी का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। 
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आईआईटी कानपुर - फोटो : सोशल मीडिया
आईआईटी की तकनीक
आईआईटी की तकनीक हाइब्रिड सिस्टम से सीवेज ट्रीट किया जाएगा। इस सिस्टम में मशीन का प्रयोग नहीं होता। नेचुरल माध्यम से ट्रीटमेंट किया जा है। यह तीन लेयर का नेचुरल सिस्टम है। प्रो. तारे के मुताबिक, इसका ट्रायल पिछले दो साल से घर पर पूरी तरह सफल रहा है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
इटली की तकनीक
सीवेज शोधन में इटली की एसएल फार्मिंग मेंब्रेन तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह अत्याधुनिक तकनीक है। इसमें कम प्रेशर पर भी सीवेज के पानी का शोधन हो सकेगा। अभी तक शोधन में हाई प्रेशर की जरूरत पड़ती है। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
बेल्जियम की तकनीक
बेल्जियम की आईटीसी मेंब्रेन तकनीक से सीवेज के पानी को कन्संट्रेट किया जाता है। इससे वाटर ट्रीटमेंट करने के साथ एनर्जी भी विकसित की जा सकेगी।
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