बेटी ज्योति के हत्यारों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद बूढ़े पिता शंकर नागदेव के कलेजे में जो ठंडक पहुंची उसने उनके आठ साल के संघर्ष के दौरान हुई शारीरिक और मानसिक थकान को पूरी तरह मिटा दिया। कोर्ट से बाहर निकलते वक्त उनके चेहरे पर चमक तो थी लेकिन आंखों में आंसू भी थे।
मीडिया के सवालों का जवाब देने के लिए रुके तो लगा जैसे एक पल के लिए ज्योति के जन्म से लेकर मृत्यु तक का सारा वाक्या उनके जहन में कौंध उठा है। जबलपुर में 1 सितंबर 1988 को पूजा उर्फ ज्योति के जन्म से घर की फुलवारी खुशियों से महक उठी थी। पूजा की किलकारियां घर में गूंजती थीं, छोटे-छोटे हाथों से मां-बाप की उंगली पकड़कर नन्हें कदम बढ़ाना शंकर नागदेव को आज भी जैसे कल की बात लगती है। पूजा की सभी यादें आज भी उनके दिल में हैं। बड़ी हुई तो स्कूल जाना शुरू किया।