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अटल वाक्य ''न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यश'', जानिए ऐसा क्यों बोला भारत रत्न वाजपेयी ने

Fri, 17 Aug 2018 12:40 AM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
"न भीतो मरणादस्मि केवलम् दूषितो यश"
भगवान राम ने कहा था कि मैं मृत्यु से नहीं डरता। अगर डरता हूं तो बदनामी से डरता हूं, लोकापवाद से डरता हूं। चालीस साल का मेरा राजनीतिक जीवन खुली किताब है। लेकिन जनता ने जब भारतीय जनता पार्टी को सबसे बड़े दल के रूप में समर्थन दिया तो क्या जनता की अवज्ञा होनी चाहिए।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
जब राष्ट्रपति महोदय ने मुझे सरकार बनाने के लिए बुलाया और कहा कि कल आपके मंत्रियों की शपथ विधि होनी चाहिए और 31 तारीख तक आप अपना बहुमत सिद्ध कीजिए तो क्या मैं मैदान छोड़कर चला जाता...? मैं पलायन कर जाता...? जिस जनता का हमने विश्वास अर्जित किया है क्या उसकी अवज्ञा करता...?
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
मैंने जब चर्चा आरंभ की थी तब इसका भी स्पष्टीकरण किया था। क्या यह तथ्य नहीं है कि हम सबसे बड़े दल के रूप में उभरे हैं...? इस बारे में जो और तर्क दिए जा रहे हैं मैं उन पर आउंगा। क्या राष्ट्रपति महोदय से कहा कि नहीं पहले मुझे जरा बात कर लेने दो। जब वह कह रहे हैं कि कल शपथ विधि होगी और मुझे समय दे रहे हैं 31 तारीख तक का तो मैंने कहा कि 31 तारीख तक जो समय दिया जा रहा है उसका मैं सदुपयोग करूंगा।

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
अन्य दलों से चर्चा करूंगा उनका समर्थन प्राप्त करने का प्रयास करूंगा। एक कॉमन प्रोग्राम के आधार पर आगे बढ़ सकें इस तरह का वातावरण बनाने की कोशिस करूंगा। इसमें क्या आपत्ति की बात है... इसमें कौन सा सत्ता लोभ है...और फैसला केवल मेरा अकेला का नहीं था फैसला पार्टी का था।

 
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
अध्यक्ष महोदय जब एक बार 31 तारीख शक्ति परीक्षण के लिए तय हो गई और शक्ति परीक्षण संसद में ही हो सकता है राष्ट्रपति भवन या राजभवन में हो इसका तो हमने कभी प्रतिपादन नहीं किया, तो सदन की बैठक बुलाना जरूरी था। सदन की बैठक में राष्ट्रपति महोदय का अभिभाषण जरूरी था।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
हम तो कई और भी काम रख सकते थे, कम से कम राष्ट्रपति महोदय को उनके अभिभाषण के लिए धन्यवाद देने का काम तो कर ही सकते थे, लेकिन आपने ऐसा नहीं होने दिया और मैंने भी संदेह पैदा न हो इसलिए इस बात पर जोर नहीं दिया। जल्दी से जल्दी पहला अवसर तय किया गया और इसलिए 27 तारीख और 28 तारीख को आज फैसला होने जा रहा है।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
हम बल दे सकते थे कि हमें 31 तक का समय दिया गया है हम कुर्सी पर बैठे रहेंगे। अध्यक्ष महोदय कमर के नीचे वार नही होना चाहिए। नीयत पर शक नहीं होना चाहिए। मैंने यह खेल नही किया है मैं आगे भी नहीं करूंगा। लोकतंत्र एक व्यवस्था है और अब गिनाया जा रहा है कि आपको कितने परसेंट वोट मिले।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
हमने जो वैस्टमिंस्टर की पद्धति अपनाई है उसमे वोट नहीं गिने जाते हैं। प्रतिशत नहीं देखा जाता है। उसमें सीटें देखी जाती हैं। दोनों काम साथ नहीं हो सकते हैं। यहां लिस्ट पद्धति वाला प्रपोर्शनल रिप्रजेंटेशन नहीं है और मैं इस पद्धति के दोषों को पहले से ही इंगित करता रहा हूं। कभी कभी ऐसा हो सकता है कि जिस दल का देश में बहुमत न हो वह दल अधिक सीटें लेने में सफल हो जाए।

अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा दिए संसद में दिए गए ऐतिहासिक भाषण का अंश है जोकि 'राजनीति की रपटीली राहें' किताब से लिया गया है।
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