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कानपुर की शान: बम डिफ्यूज कर रहीं बेटियां, बारूदी सुरंग बिछाती हैं अदिति, अनुश्री ने पूरा किया वर्दी वाली नौकरी का सपना

Mon, 05 Apr 2021 09:41 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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सेना में नाम कमा रहीं बेटियां - फोटो : अमर उजाला
चूल्हा-चौका छोड़ अब महिलाएं देश सेवा में जुटी हैं। हाथों में चूड़ियों की जगह बम डिफ्यूज करने वाले यंत्र, घूंघट की जगह सेना की टोपी पहने ये महिलाएं मातृभूमि की रक्षा में जोश के साथ जुटी हैं। सेना की कठिन ट्रेनिंग करके कोई मेजर बनीं तो कोई लेफ्टिनेंट। आइए, आपको बताते हैं इनके बारे में...  
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अदिति मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
बारूदी सुरंग बिछाने और डिफ्यूज करने का काम करती हैं अदिति
स्वरूप नगर की रहने वाली अदिति मिश्रा सेना में मेजर हैं। वर्तमान में वह दिल्ली में सेना की इंजीनियर्स शाखा में तैनात हैं। यह शाखा युद्ध के दौरान बारूदी सुरंग (माइंस) बिछाने और डिफ्यूज करने, सैनिकों के लिए अस्थायी ब्रिज बनाने का भी काम करती है। साथ ही कुकर बम, पेन बम को भी डिफ्यूज करने की जिम्मेदारी इस शाखा के सैनिकों पर होती है। किशोर मिश्रा और रूपीना की बेटी अदिति को फिल्म से सेना में जाने की प्रेरणा मिली थी। उन्होंने पढ़ाई के दौरान एनसीसी एयरविंग में प्रवेश भी लिया। इसके बाद सेना में उनका चयन 2008 में लेफ्टिनेंट के पद पर हुआ। पहली पोस्टिंग लद्दाख के कुमाथांग में मिली थी। प्रमोशन के बाद वह मेजर बनीं। अदिति कहती हैं कि देश सेवा से बढ़कर कुछ भी नहीं।
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विनीता त्रिपाठी - फोटो : अमर उजाला
परिवार की परंपरा को विनीता ने बढ़ाया आगे
किदवई नगर की रहने वाली विनीता त्रिपाठी ने परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया। वह हाल ही में सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर चयनित हुई हैं। उनके पिता सेना में सूबेदार हैं। विनीता परिवार की पांचवीं सदस्य हैं जो सेना में गई हैं। उनके पिता विपिन त्रिपाठी, दो चाचा और एक चचेरा भाई सेना में है। उनको पहली पोस्टिंग 158 बेस अस्पताल बागडोगरा में मिली है। विनीता कहती हैं कि सेना में आने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती हैं, लेकिन एक बार जब आप वर्दी पहनते है तो सब कुछ भूल केवल गर्व का अनुभव होता है। विनीता कहती हैं कि उनको देख परिवार की और बेटियां भी अब सेना में आने के लिए तैयारी कर रही हैं।

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अनुश्री मिश्रा - फोटो : अमर उजाला
बचपन से था वर्दी वाली नौकरी करने का सपना
तिलक नगर की रहने वाली अनुश्री मिश्रा लेफ्टिनेंट हैं। 2018-19 में लेफ्टिनेंट बनी अनुश्री को पहली पोस्टिंग लेह में मिली थी। अब उनकी ट्रेनिंग उड़ीसा में चल रही है। अनुश्री बचपन से ही वर्दी वाली नौकरी करना चाहती थीं। उन्हें एयरफोर्स से लगाव था लेकिन किसी वजह से वह उसमें चयनित नहीं हो पाईं। उन्होंने बताया कि जब परिवार के लोग सोते थे तो वह सुबह अपने सपने को पूरा करने के लिए कसरत करती थीं। अनुश्री के पिता एके मिश्रा एलआईसी में हैं और मां बीनू शिक्षिका हैं। बीनू कहती हैं कि बेटी के सेना के प्रति लगाव को देखते हुए किसी ने भी उसे नहीं रोका। अभी ट्रेनिंग चलने के कारण दिन में चार-पांच मिनट ही उससे बात हो पाती है। अनु परिवार की पहली लड़की है जो सेना में गई है।
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डॉ. दीप्ति तिवारी - फोटो : अमर उजाला
वैज्ञानिक की नौकरी छोड़ डॉ. दीप्ति बना रहीं अचार और पट्टी 
अपनी मर्जी से काम करने की आजादी पाने के लिए डॉ. दीप्ति तिवारी ने वैज्ञानिक की नौकरी छोड़ी, आत्मनिर्भर बनीं। इसके बाद कैंप लगाकर 300 से अधिक महिलाओं को विभिन्न उत्पादों को बनाने का प्रशिक्षण देकर स्वावलंबी बनाया। यही नहीं, 50 महिलाओं को रोजगार भी दिलाया।

कल्याणपुर के केशवपुरम निवासी डॉ. दीप्ति ने सीएसए से बीएससी करने के बाद बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से फूड टेक्नोलॉजी में एमएससी और पीएचडी की। इसके बाद गुरुग्राम की नेशनल ऑयल एंड सीड्स कंपनी में बतौर वैज्ञानिक उनकी नौकरी लग गई। डॉ. दीप्ति कहती हैं कि नौकरी अच्छी थी, पैसा-सम्मान सब था। लेकिन मन में कुछ खालीपन था।

अपना काम करने की इच्छा बार-बार विचलित कर रही थी। परिवार से बात की और 2011 में नौकरी छोड़कर कानपुर आ गई। आत्मनिर्भर भारत अभियान से प्रेरणा लेकर मंधना में अपना काम डाला। शुरुआत आर्गेनिक अचार बनाने से की। उसके बाद मसाले, गुड़ की चिक्की (पट्टी) बनाने का काम शुरू किया। आंध्रप्रदेश सरकार से समझौता हुआ है। वहां प्राइमरी स्कूलों में मिड-डे मील के रूप में चिक्की यहीं से जाती है। उन्होंने कहा कि काम की शुरुआत 14 हजार बच्चों के साथ हुई है। डॉ. दीप्ति कहती हैं कि जल्द ही और भी उत्पाद बनाना शुरू करेंगी। आने वाले समय में गांव की महिलाओं को स्वावलंबी बनाने का लक्ष्य है। उन्होंने पति हेमंत के सहयोग की भी सराहना की।
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