शहर से सटे गांव रसूलपुर में पटाखा फैक्ट्री में हुए विस्फोट में आठ लोगों की मौत की खबर सुनकर हर कोई हिल गया। घटना के बारे में जिसने सुना, वही पहले मौके पर फिर जिला अस्पताल को दौड़ा। शहर से रसूलपुर गांव करीब छह किलोमीटर दूर है। पटाखा फैक्ट्री में धमाका इतनी तेज था कि कुछ समय तक लोग यह समझ नहीं पाए आखिर यह आवाज कहां से आई है। गांव रसूलपुर के सैकड़ों लोग अपने घरों से निकलकर सड़कों पर आ गए। एकाएक गांव के हालात ऐसे थे जैसे किसी ने साजिश के तहत घटना को अंजाम दिया हो। चूंकि जिस दुकान में यह हादसा हुआ था वह उड़ गई थी। लोगों की यह हिम्मत नहीं हो रही थी कि वे वहां तक जाएं। कुछ देर तक पटाखों की गूंज में लोगों की आवाज दबकर रह गई।
जब पटाखों की आवाज कुछ कम हुई तो गांव के कुछ नौजवानों ने वहां जाने का साहस किया। कुछ ही देर में कई लोग मौके पर आ गए। सभी हादसे में जख्मी और मरे लोगों को बाहर निकालने में जुट गए। पास के गांव दौरीनरोत्तमपुर के अलावा कुछ अन्य गांव के भी लोग वहां पर आ गए। सभी हादसे से प्रभावित लोगों को निकालने में लग गए। खबर मिलने के बाद मौके पर पहुंची एंबूलेंस के जरिए उन लोगों को जिला अस्पताल भिजवाया गया। हादसे से प्रभावित लोगों के परिजन अस्पताल की ओर दौड़ पड़े।
चीत्कारों से दहल उठा जिला अस्पताल
पटाखा फैक्ट्री में भीषण हादसे के बाद जिला अस्पताल में हजारों की संख्या में लोग देर शाम तक पहुंच गए। पीड़ित परिजनों के हालात को देखकर वहां मौजूद कोई भी व्यक्ति अपने आंसू रोक नहीं पा रहा था। हर किसी की जुबान से यही निकल रहा था कि बहुत बुरा हुआ।
पीड़ित के परिजनों की महिलाओं-पुरुषों और बच्चों की चीत्कार से जिला अस्पताल गूंजता रहा। बहुत से लोग परिजनों को समझाने-बुझाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन उनका यही कहना था कि सब कुछ खत्म हो गया। मासूम बच्चों को समझाने में पुलिस अफसर भी लगे थे। मगर वह किस तरह शांत हो पाते। उनके परिवार के लोग भी इस हादसे में चले गए। चूंकि अस्पताल में हादसे की खबर सुनने के बाद रसूलपुर, दौरीनत्तोमपुर के अलावा आसपास गांवों के साथ ही शहर के भी काफी संख्या में लोग आ गए थे इसलिए एहतियातन थाना सिविल लाइन, कोतवाली, कुंवरगांव, मूसाझाग आदि थानों की पुलिस को भी बुला लिया गया था। पीएसी के जवान भी थे।
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बदायूं पटाखा फैक्ट्री धमाका
- फोटो : अमर उजाला
हादसे के लिए प्रशासन भी कम जिम्मेदार नहीं
आमतौर पर जब भी दिवाली आती है तब शासन से इस बात की जिला प्रशासन को गाइड लाइन जारी होती है कि कोई भी आतिशबाजी की दुकान या फिर गोदाम या फैक्ट्री आबादी के बीच नहीं होनी चाहिए। इस बात का भौतिक सत्यापन किया जाए। देखा जाए कि जहां पर दुकान-फैक्ट्री या गोदाम है, वहां पर सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं। क्या संबंधित मानकों को पूरा कर रहा है अथवा नहीं। यदि नहीं तो उसके खिलाफ क्या एक्शन लिया गया। इतने निर्देश के बाद भी रसूलपुर हादसे ने जिला प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
थाना सिविल लाइन के गांव दौरीनरोत्तमुर निवासी संजू की दो-ढाई साल से पटाखा फैक्ट्री चल रही थी। वह आदर्शनगर निवासी श्यामलाल की दुकान में अपना कारोबार चला रहा था। संजू शादी, दिवाली या अन्य समारोह में ऑर्डर पर आतिशबाजी बनाकर बेचता था। शुक्रवार को जब उसकी फैक्ट्री में हादसा हुआ तब लोग यह कहते चुप नहीं हो रहे थे कि आखिर प्रशासन क्या कर रहा था। कभी प्रशासन ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि फैक्ट्री पर कितनी क्षमता के पटाखे बनते हैं। पटाखों की सुरक्षा के फैक्ट्री में क्या इंतजाम हैं। कितना बारूद उसमें रखा था। या फिर फैक्ट्री में जो बारूद था वह लाइसेंस के अनुसार था या नहीं। यदि लोगों की बात को सच माना जाए तो प्रशासन ने काफी समय से इस फैक्ट्री का भौतिक सत्यापन भी नहीं किया था। यदि दिवाली के मद्देनजर ही भौतिक सत्यापन किया होता तो यह सामने आ जाता कि फैक्ट्री में कितनी क्षमता के पटाखे बन रहे हैं और कितने बारूद प्रयोग में लाई जा रही है। लोगों का कहना है यदि यह सब प्रशासन ने देखा होता तो शायद यह हादसा नहीं होता।
मंसढ़ बारूद होती है इस्तेमाल
पटाखा बनाने वाले मंसढ़ बारूद का इस्तेमाल करते हैं। जानकार बताते हैं कि यह अत्यधिक आवाज करती है और जल्द ही विस्फोट होता है। बताया जा रहा है कि शायद इसी मंसढ़ बारूद का पटाखों में इस्तेमाल किया जा रहा होगा। यह बारूद बदायूं जिले के अलावा अन्य जिलों से खरीदकर लाई जाती है। हालांकि इसका लाइसेंस प्रशासन की ओर से दिया जाता है। इसमें इस बात का पूरा उल्लेख रहता है कि कौन सी बारूद और कितनी मात्रा में इस्तेमाल की जानी है। जानकारों की बात को यदि सच माना जाए तो करीब दस साल पहले तक छह किलो बारूद का लाइसेंस जारी होता था। अब शासन ने इसे बढ़ाकर 15 किलो कर दिया है।