यूपी के प्रयागराज में एक बार फि से तंबुओं की नगरी गुलजार हो गई है। आज से शुरू कल्पवास एक फरवरी को माघी पूर्णिमा पर पूर्ण होगा। प्रयागराज में कल्पवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
प्रयागराज में संगम की रेती पर शनिवार को पौष पूर्णिमा के पहले स्नान पर्व के साथ ही माघ मेला ही नहीं कल्पवास भी शुरू हो गया। ऐसी मान्यता है कि माघ मास में सभी देवी-देवता प्रयागराज में ही वास करते हैं, इसलिए यहां पौष पूर्णिमा से कल्पवास की शुरुआत होती है। प्रयागराज में कल्पवास करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
संगम की रेती पर बने तंबुओं में गृहस्थ और साधु-संत कल्पवास करते हैं। कल्पवास में लोगों की दिनचर्या नियमित और संयमित होती है। अखिल भारतीय दंडी संन्यासी परिषद के संरक्षक स्वामी महेशाश्रम महाराज के मुताबिक पौष पूर्णिमा पर जो श्रद्धालु कल्पवास के लिए आते हैं, उन्हें सबसे पहले संगम तट पहुंचने पर गणेश पूजन करना चाहिए।
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माघ मेला क्षेत्र स्थित खाक चौक में स्नान ध्यान के बाद धुनी के सामने बैठे साधु
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इसके बाद गंगा पूजन और रेत से पिंडी बनाकर सभी देवी-देवताओं का पूजन करना चाहिए। इसके बाद श्रद्धालु अपने शिविर में पहुंचते हैं। जहां शिविर के बाहर तुलसी और कदली का पौधा रोपने का विधान है।
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पौष पूर्णिमा स्नान पर्व को लेकर मेला क्षेत्र में जाते कल्पवासी
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स्वामी बताते है कि प्रयाग, माघ और कल्पवास तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं। इसका पौराणिक और शास्त्र वर्णित है कि श्रद्धालु पौष पूर्णिमा पर गंगा स्नान कर कल्पवास का संकल्प लेकर एक माह का कठिन तप और व्रत की शुरुआत करते हैं। इस दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
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Magh Mela 2026
- फोटो : अमर उजाला
तीन पहर गंगा स्नान और भूमि पर शयन करते हैं। एक पहर गुरु को भोजन कराने के बाद भोजन ग्रहण करते हैं। अपनी कुटिया में देवी-देवताओं की पूजा अर्चना के साथ ही रामायण और गीता का पाठ करते हैं। संत महात्माओं की कथाओं और प्रवचन का श्रवण करते हैं।
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मेला क्षेत्र में कल्पवास के लिए वाहनों पर सवार होकर श्रद्धालु पहुंचे
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इस तरह से माघी पूर्णिमा तक कल्पवास का संकल्प चलता रहता है। कल्पवास पूरा होने पर श्रद्धालु भगवान सत्यनारायण की कथा का श्रवण कर आध्यात्मिक ऊर्जा बटोर कर अपने घर को लौटते हैं। वहीं, माघी पूर्णिमा के बाद भी कई साधु-संत और कल्पवासी मेले में बने रहते हैं। बताते है कि वे त्रिजटा स्नान के बाद अपने आश्रम व घरों के लिए वापसी करते हैं।
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माघ मेला क्षेत्र में पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से पहले तैयार दिखी तंबुओं की नगरी
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संगम तट पर आस्था का वास, कल्पवासियों से गुलजार तंबुओं की नगरी
संगम की रेती पर एक बार फिर आस्था ने डेरा डाल दिया है। शनिवार से शुरू हो रहे कल्पवास के लिए लाखों श्रद्धालु संगम तट पर पहुंच चुके हैं। दूर-दराज के क्षेत्रों से आए कल्पवासी व्रत-तप, साधना और संयम का संकल्प लेकर तंबुओं की नगरी में बस गए हैं। पूरे क्षेत्र में जप, तप और पूजा-अनुष्ठान की तैयारी हो रही है।
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माघ मेला क्षेत्र में पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से पहले तैयार दिखी तंबुओं की नगरी
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शुक्रवार देर शाम तक श्रद्धालुओं का आगमन जारी रहा। कल्पवासियों ने अपने-अपने शिविरों में पहुंचकर आवश्यक सामान व्यवस्थित किया। संग लाए तुलसी के पौधों को कुटिया के बाहर रोपा गया, जबकि ठाकुर जी, पूजा सामग्री, दान की वस्तुएं, राशन और वस्त्र शिविरों के भीतर रखे गए। ई-रिक्शा, कार, पिकअप और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के माध्यम से पुआल, बिस्तर, राशन और जलावन लकड़ी लाते कल्पवासी पूरे दिन नजर आए।
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माघ मेला क्षेत्र में पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से पहले तैयार दिखी तंबुओं की नगरी
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सहसों निविगारापुर निवासी 71 वर्षीय श्याम मुरारी तिवारी अपने परिवार के साथ ओल्ड जीटी रोड स्थित डूंग जी भूरा मठ के शिविर में कल्पवास करने पहुंचे हैं। उन्होंने बताया कि वे कई वर्षों से पूरे परिवार के साथ कल्पवास कर रहे हैं। प्रतापगढ़ जिले के सराय नहर राय निवासी कमल किशोर पांडेय भी अपनी पत्नी के साथ शिविर में पहुंच गए हैं। उन्होंने संगम स्नान के बाद कल्पवास के शुभारंभ की बात कही।
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पौष पूर्णिमा स्नान पर्व को लेकर मेला क्षेत्र में पहुंचे कल्पवासी
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कौशाम्बी निवासी 80 वर्षीय राजकुमारी देवी अपनी 12 वर्षीय नातिन अदिती मिश्र के साथ कल्पवास करने आई हैं। अदिती ने बताया कि स्कूल बंद होने के कारण वह दादी की सेवा के लिए साथ आई है। वहीं, 22 वर्षों से कल्पवास कर रहे राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने इसे जीवन का अभिन्न हिस्सा बताया। भदोही जिले के भवानीपुर निवासी रामयज्ञ शुक्ल ने बताया कि नियम के अनुसार कल्पवास के आरंभ पर संकल्प लिया जाएगा।
माघ मेला क्षेत्र में पौष पूर्णिमा स्नान पर्व से पहले नौका विहार को जुटी श्रद्धालुओं की भीड़
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तुलसी पूजन का विशेष विधान
तीर्थ पुरोहितों के अनुसार कल्पवास के दौरान तुलसी पूजन का विशेष महत्व है। इसी कारण प्रत्येक कुटिया के बाहर तुलसी, केले और जौ के पौधे लगाए जा रहे हैं। मान्यता है कि जौ की वृद्धि के साथ ही सर्व मंगल और प्रगति होती है। कल्पवास के दौरान श्रद्धालु संगम की रेती पर व्रत, तप और पूजा-अनुष्ठान के साथ कठोर नियमों का पालन करेंगे। कल्पवासी दिन में दो बार स्नान और एक समय भोजन करेंगे। एक माह तक संयमित जीवन, साधना और सेवा ही उनका मुख्य संकल्प रहेगा।