बैकुंठधाम आश्रम अलोपीबाग स्थित प्रयाग पीठाधीश्वर जगद्गुरू रामानुजाचार्य श्रीधराचार्य महाराज ने बताया कि गंगा-यमुना के संगम तट पर माघ मास में जब मकर के सूर्य होते हैं तभी कल्पवास किया जाता है। यहां एक मास तक एक पहर भोजन, तीन बार स्नान करके अग्नि-सूर्य पूजन करके लोग एक मास तक संगम तट पर निवास करने को कल्पवास कहते हैं। माघ मास में प्रयाग में किया गया निवास एक कल्प के बराबर पुण्य प्रदान करता है। सभी पाप नष्ट होते हैं। पुरखों को तृप्ति मिलती है।
साधक को ब्रह्मलोक और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयाग महात्म्य में कहा गया है कि कल्पवासी को संगम में तीन बार स्नान करना चाहिए। स्नानमात्रेण मुच्यन्ते नराः पापात् सहस्रशः। संगम में केवल स्नान मात्र से ही मनुष्य हजारों पापों से मुक्त हो जाता है भूमि पर शयन, एक समय सात्विक भोजन, ब्रह्मचर्य एवं संयम, नित्य जप-तप, ध्यान, हवन, अन्न, वस्त्र, तिल, घृत का दान, सत्य, अहिंसा और शुद्ध आचरण करना चाहिए। धार्मिक स्रोतों के अनुसार मान्यता है कि कल्पवास केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर आध्यात्मिक साधना, सामाजिक समरसता, संयमित जीवन-शैली का आदर्श है।
क्या है कल्प
कल्प एक काल की ऐसी स्थिति है, जिसको माप कहते हैं। काल मापक यंत्र है कल्प। “विगता कुंठा विकुंठा विकुंठे भवा वैकुंठा'''' एक कल्प तक बैकुंठ में कुंठा रहित जीवन व्यतीत करना, एक कल्प तक संगम तट पर एक मास निवास करने का फल है।