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CoronaVirus: प्रयागराज में डेयरियां बंद होने के कगार पर, रोग के डर से लोग नहीं ले रहे दूध

Thu, 26 Mar 2020 11:46 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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डेमो - फोटो : डेंमो
कोरोना वायरस से बचाव के मद्देनजर जारी लॉकडाउन की वजह से पशुपालकों और डेयरी संचालकों के सामने घोर संकट खड़ा हो गया है। दूध जरूरी वस्तुओं की सूची में सबसे ऊपर है लेकिन इसका उत्पादन करने वालों के सामने परिवार पालने की समस्या आ गई है। दुग्ध की मांग कम हो गई है।

इसके अलावा रोक की वजह से दुधिया शहर में दूध नहीं ले आ पा रहे। कई जगहों पर तो ग्रामीणों में इस कदर भय है कि मुफ्त में भी दूध लेने के लिए तैयार नहीं है। इसकी वजह से कई डेयरियां बंद हो चुकी हैं या बंद होने के कगार पर हैं। इस समस्या से राहत के लिए कई पशुपालकों ने घी का उत्पादन बढ़ाने की पहल की लेकिन दही से घी बनाने की प्रक्रिया काफी कठिन और महंगी है। इसलिए इससे भी उन्हें निराशा है।
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दूध - फोटो : getty images
झूंसी का बदौरा सोनौटी गांव दुग्ध आपूर्ति का हब माना जाता है। गांव के जंगीलाल का कहना है कि लेकिन इन दिनों धंधा बंद हैं। कालाबाजारी जरूर शुरू हो गई है कि लेकिन पशुपालक लाचार हैं। धरम सिंह यादव का कहना है कि पुलिस जगह-जगह रोक रही है।  इसलिए वे दूध शहर नहीं ले जा रहे। उनका कहना है कि डेयरी पर तो अब भी 50 रुपये प्रति लीटर दूध लिया जा रहा है लेकिन बहुत कम। सोरांव में डीहा गांव के जंगबहादुर यादव का कहना है कि दूध की मांग कम हो गई है। डेयरी वाले दूध नहीं ले रहे।
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दूध
इसलिए खोवा बनाने का निर्णय लिया गया लेकिन उसकी भी खपत नहीं है। स्थिति यह है कि प्रति किग्रा 60 से 70 रुपये में खोवा बिक रहा है। जबकि, सामान्य दिनों में 150 से 170 रुपये प्रति किग्रा बिकता था। भावापुर के रामबिंद पटेल का कहना है कि एक टाइम के दूध की दही जमाई जा रही है। ताकि, इससे घी बनाया जा सके लेकिन यह बहुत कठिन है। मेजा के अमीलिया कला में डेयरी है लेकिन दूध की मांग नहीं होने की वजह से वह बंद है।

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गांव के अरुण तिवारी के यहां रोजाना 50 से 60 लीटर दूध का उत्पादन होता है। उनका कहना है कि डेयरी बंद हो जाने से दूध बेकार हो जा रहा है। उनका कहना है कि पहले तो कोशिश की गई कि घी बनाया जाए लेकिन यह आसान नहीं है। मेजा में ही नीबी गांव के हौसला मिश्रा के पास दो दर्जन गाय और भैंस हैं। उनके दूध की शहर में आपूर्ति होती है लेकिन अब बंद है। उनका कहना है कि कोरोना के डर की वजह से लोग गांव में भी दूध नहीं ले रहे। इससे दूध खराब हो रहा है। इस तरह की समस्या पूरे जिले में पशुपालकों और डेयरी संचालकों के सामने है।
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पशु चारा

दोहरी मार, चारा हुआ महंगा

पशुपालकों को दोहरी मार पड़ रही है। दूध की मांग कम हो गई है लेकिन चारा की कालाबाजारी शुरू हो गई है। झूंसी के हेता पट्टी में पहले चोकर की 50 किग्रा की बोरी 895 रुपये में मिल जाती थी लेकिन अब इसकी कीमत 1300 से 1400 वसूली जा रही है। इसी तरह की शिकायत सोरांव के पशुपालकों की भी रही।

चारे के वाहनों को न रोके प्रशासन 

सपा नेता एमएलसी बासुदेव यादव, निवर्तमान महानगर अध्यक्ष सै.इफ्तेखार हुसैन ने भूसे के वाहनों को न रोके जाने की मांग की है। उन्होंने डीएम को पत्र भी लिखा है। नेताओं का कहना है कि वाहनों के रोके जाने से पशुपालकों के सामने चारा का संकट खड़ा हो गया है। उन्होंने ग्रामीण इलाकों में दूधियों को भी रोके जाने की शिकायत की है। उनका कहना है कि पशुओं को चारा नहीं मिलने तथा दूधियों को रोके जाने से दूध की आपूर्ति प्रभावित हो जाएगी। जिला प्रवक्ता दान बहादुर मधुर ने शहरों में फंसे मजदूरों, रेहड़ी वालोें को जांच के बाद घर भेजने की व्यवस्था किए जाने की मांग की है। 
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चारा

किसानों पर अब ओलावृष्टि के बाद कोरोना की मार

किसानों की मुसीबत कम होने के बजाय बढ़ती ही जा रही है। बेमौसम की बारिश और ओलावृष्टि से परेशान किसानों का कोरोना वायरस की वजह से संकट और बढ़ गया है। लागत भी नहीं निकल पाने की वजह से बड़ी संख्या में किसान सब्जियाें की पैदावार खेत में ही छोड़ने के लिए मजबूर हैं।

बारिश में रबी की फसलों के साथ सब्जियों की खेती पूरी तरह से बर्बाद हो गई। अब लॉकडाउन होने की वजह से वे सब्जियों को मंडियों तक नहीं ले जा पा रहे हैं। किसानों का कहना है कि उन्हें जगह-जगह रोका जा रहा है। इसकी वजह से वे गांव या पास के ही बाजार में कम दाम में सब्जी बेचने के लिए मजबूर हैं। सोरांव सब्जी की खेती का हब है। वहां के बर्चनपुर गांव के राकेश पटेल का कहना है कि पत्ता गोभी जो पहले 12 से 15 रुपये में बिक जाती थी, अब उसके चार से पांच रुपये ही मिल रहे हैं। यही स्थिति पालक को लेकर भी है।

लहटी गांव के दिनेश का कहना है कि उनकी टमाटर की खेती है। मौसम अनुकूल नहीं होने की वजह से उत्पादन पहले से घट गया है। अब खपत नहीं होने की वजह से उन्होंने फसल की देखभाल भी छोड़ दी है। कौंधियारा के अशोक का कहना है कि ग्रामीण मंडी में सब्जियोंका उचित दाम मिल रहा है लेकिन जगह-जगह टोका-टाकी की वजह से किसान मंडी तक सब्जी नहीं ले जा रहे।
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चारा - फोटो : अमर उजाला

किसानाें के सामने फसलों मड़ाई का भी संकट

किसानों की समस्या आगे भी दूर होती नहीं दिख रही। ओलावृष्टि से पहले ही फसल बर्बाद हो चुकी है। जो फसल बची है उसकी मड़ाई का संकट भी खड़ा होने जा रहा है। फसल तैयार है तथा कई जगहों पर मड़ाई भी शुरू हो गई है। यहां ट्रैक्टर थ्रेशर से गेहूं की मड़ाई होती, जो पंजाब आदि प्रदेश से आते हैं लेकिन लॉकडाउन की वजह अभी तक नहीं आ पाए हैं। रोक को देखते हुए थ्रेशर युक्त टैक्टर के आने को लेकर  दुविधा भी बनी हुई है।
 
इसके अलावा कई जगहों पर मड़ाई से किसानों को रोके जाने की भी शिकायत हुई है। वामपंथी नेता हरिश्चंद्र द्विवेदी का कहना है कि सरसों, मटर, मसूर, चना आदि की मड़ाई चल रही है। किसान अपने थ्रेशर से मड़ाई कर रहे हैं लेकिन पुलिस रोक रही है। उनका कहना है चित्रकूट, फतेतपुर आदि जिलों में इस तरह की शिकायत हैं। उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि मड़ाई न रोकी जाए। उनका कहना है कि मड़ाई की व्यवस्था कराके एक और बड़ी समस्या को आने से रोका जाए।
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