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इलाहाबाद विवि का स्थापना दिवस आज : स्मॉर्ट कक्षाओं और प्रयोगशालाओं से बदला ‘पूरब का ऑक्सफोर्ड’

Fri, 23 Sep 2022 05:47 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) की स्थापना को आज (23 सितंबर) 135 साल पूरे हो गए। सिर्फ 13 छात्रों के साथ शुरू हुआ म्योर कॉलेज ठसक के साथ ‘पूरब का आक्सफोर्ड’ तक कहलाया।
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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। विजयनगरम हॉल। - फोटो : अमर उजाला।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) की स्थापना को आज (23 सितंबर) 135 साल पूरे हो गए। सिर्फ 13 छात्रों के साथ शुरू हुआ म्योर कॉलेज ठसक के साथ ‘पूरब का आक्सफोर्ड’ तक कहलाया। यहां जो पौधा रोपा गया, वह वटवृक्ष बन गया। इसकी गौरवगाथा रोमांचित करने वाली है। यह और बात है कि समय की मार ने स्थिति ऐसी ला दी है कि जिस विश्वविद्यालय को आईएएस की फैक्ट्री कहा जाता था, आज वहां से अफसरी का उत्पादन तकरीबन ठप हो चुका है।


चुनौती यह भी है कि नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआईआरएफ) की ओर से जारी होने वाली देश के शीर्ष 200 संस्थानों में यह कैसे जगह बना पाए। हालांकि, प्रबंधन के ताजा फैसले और प्रयास सुखद संकेेत देते हैं। स्मॉर्ट कक्षाओं, नई प्रयोगशालाओं से लेकर शिक्षकों की व्यापक भर्ती ने शोध के जो रास्ते खोले हैं, उनमें यह संकल्प दिखता है कि विश्वविद्यालय अपनी साख को हासिल करने के लिए गियर बदल चुका है। अमित सरन की रिपोर्ट...


एक वक्त था, जब एमएनएनआईटी और मेडिकल कॉलेज भी इविवि का हिस्सा हुआ करते थे। बाद में यह विश्वविद्यालय से अलग हो गए और इविवि महज 40 विभागों का संस्थान रह गया। बीएचयू जैसे संस्थानों के पास भी अपने इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज हैं। रैंकिंग में उन्हें इसी का फायदा मिलता रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन अब कृषि संकाय शुरू करने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा गया है। 


कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव की पहल पर इविवि में एक साल के अंदर लगभग ढाई सौ शिक्षकों की नियुक्तियों के साथ विश्वविद्यालय के नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। जेएनयू, बीएचयू, आईआईटी जैसे संस्थानों से शिक्षक यहां पढ़ाने आए हैं। प्रयास है कि इन्हें अच्छी से अच्छी सुविधाएं दी जा सकें, ताकि वे रिसर्च के क्षेत्र यहां विकसित कर सकें। 
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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। सीनेट हाल। - फोटो : अमर उजाला।
स्कोपस में इंडेक्स जर्नल में ही छपेंगे पेपर
एनआईआरएफ शोध की जानकारी संबंधित विश्वविद्यालय से नहीं लेता है, बल्कि स्कोपस संस्था से उसे यह जानकारी मिलती है। यह संस्था गूगल की तरह काम करती है। सर्च कराने पर शोध की जानकारी मिल जाती है। इविवि में हर साल तकरीबन एक हजार रिसर्च पेपर लिखे जाते हैं, लेकिन सभी पेपर स्कोपस में इंडेक्स जर्नल में नहीं छपते हैं। अब अनिवार्य किया गया है कि सभी रिसर्च पेपर अनिवार्य रूप से स्कोपस में इंडेक्स जर्नल में ही छपवाए जाएं, ताकि एनआईआरएफ तक शोध की सही जानकारी पहुंचे।


हर पेपर में सुपरवाइजर, इविवि का नाम जरूरी
इविवि में कुछ दिनों पहले ही नोटिस जारी किया गया है कि हर रिसर्च पेपर में सुपरवाइजर और इविवि का नाम अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए। इविवि में तमाम रिसर्च पेपर में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। कई शोध छात्र अपने पेपर में सुपरवाइजर और इविवि का नाम लिखते ही नहीं थे, जिसकी वजह से संबंधित शोध इविवि के खाते में नहीं जुड़ रहे थे। प्रक्रिया में बदलाव से इविवि के खाते में शोध की संख्या बढ़ेगी।
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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। मोनिरबा। - फोटो : अमर उजाला।
इविवि में बनाया गया पेटेंट सेल
एनआईआरएफ रैंकिंग में पेटेंट के अंक भी शामिल किए जाते हैं और ये अंक काफी महत्वपूर्ण होते हैं। अधिक से अधिक शोध पेटेंट कराए जा सकें, इसके लिए इविवि प्रशासन की ओर से 15 दिन पहले ही पेटेंट सेल बनाया गया है। विश्वविद्यालय में इस साल पांच पेटेंट हुए हैं, जिनकी संख्या पिछले वर्षों की तुलना में अधिक है। इनमें जेके इंस्टीट्यूट के प्रो. आशीष खरे, सेंटर ऑफ फूड टेक्नोलॉजी की प्रो. नीलम यादव, गृह विज्ञान विभाग की प्रो. संगीता श्रीवास्तव के एक-एक और रसायन विज्ञान विभाग के प्रो. शेखर श्रीवास्तव के दो शोध पेटेंट हुए हैं।

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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय, छात्रसंघ भवन। - फोटो : अमर उजाला।
शिक्षकों को शोध के लिए मिलेंगे पांच लाख रुपये
कुलपति प्रो. संगीता श्रीवास्तव ने तय किया है कि विश्वविद्यालय में नियुक्त नए शिक्षकों और खासतौर पर विज्ञान के शिक्षकों को शोध के लिए विश्वविद्यालय के खाते से पांच लाख रुपये सीड मनी के रूप में प्रदान किए जाएंगे। इसके लिए इविवि प्रशासन ने शिक्षकों से प्रोजेक्ट भी मांग लिए हैं। उद्देश्य यही है कि नए शिक्षक सीड मनी से शोध करें और इसे आगे बढ़ाएं, ताकि भविष्य में बड़े प्रोजेक्ट मिल सकें।


18 नई प्रयोगशालाएं, स्मार्ट क्लासरूम भी तैयार
इविवि के विज्ञान संकाय में हाल ही में एमएन साहा कॉम्पलेक्स खुला है। इसमें 18 प्रयोगशालाएं हैं, जहां विज्ञान विषय के छात्र आकर शोध कर सकेंगे। इसमें इंस्ट्रूमेंटल कॉम्लेक्स भी तैयार किया जाएगा, जिसमें महंगे और अत्याधुनिक उपकरण रखे जाएंगे। छात्र इन उपकरणों का प्रयोग कर सकेंगे। एमएन साहा कॉम्लेक्स में स्मार्ट क्लासरूम भी बनकर तैयार हो चुका है। रैंकिंग निर्धारण के दौरान ये सभी सुविधाएं इविवि के अंकों में इजाफा करेंगी।
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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। - फोटो : अमर उजाला।
नई शिक्षा नीति के तहत 10 नए कोर्स शुरू
इविवि में नई शिक्षा नीति के तहत 10 नए इंटीग्रेटेड पाठ्यक्रम शुरू किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ पाठ्यक्रम सत्र 2022-23 से शुरू कर दिए गए हैं। इविवि प्रशासन ने शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी को इसकी जानकारी भी भेज दी है। सत्र 2023-24 से इविवि में नई शिक्षा नीति को पूरी तरह से लागू करने की तैयारी कर ली गई है। नए पाठ्यक्रमों के प्रस्ताव भी तैयार कर लिए गए हैं। 


इंक्यूबेशन सेंटर से भी रैंकिंग में सुधार की उम्मीद
इविवि में हाल ही में इंक्यूबेशन सेंटर की शुरुआत की गई है। यह सेंटर स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए खोला गया है। कुछ माह पहले यहां बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के सीईओ भी आए थे और छात्रों ने उनके सामने कुछ प्रोजेक्ट पेश किए थे। 
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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। संस्कृत विभाग। - फोटो : अमर उजाला।
101 साल पहले मिला था आवासीय विश्वविद्यालय का दर्जा

इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) की स्थापना तो 23 सितंबर 1887 को हुई थी, लेकिन आवासीय विश्वविद्यालय का दर्जा आज से 101 साल पहले मिला था। विश्वविद्यालय के सफर की शुरुआत 1872 में म्योर कॉलेज की स्थापना के साथ हुई। विलियम म्योर के प्रयासों से कॉलेज की शुरुआत हुई। 


इसकी कक्षाएं दरभंगा कैसल में चलती थीं। पहले साल कुल 13 छात्रों ने पढ़ाई शुरू की और जब म्योर कॉलेज की विशाल इमारतें 1886 में बनकर तैयार हुईं, तब तक दरभंगा कैसल में पढ़ने वालों की संख्या लॉ के छात्रों सहित 129 हो चुकी थी। 23 सितंबर 1887 में इसे यूनिवर्सिटी का दर्जा मिल गया और इसके बाद नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस ऑफ अगरा एंड अवध, सेंट्रल प्रोविंसेस (अजमेर-मेवाड़, राजपुताना और सेंट्रल इडियन एजेंसीज) के एक मात्र संघटक विश्वविद्यालय के रूप में इसकी स्थापना हुई।


इतिहासकार प्रो. योगेश्वर तिवारी बताते हैं कि मार्च 1889 में विश्वविद्यालय ने पहली बार प्रवेश परीक्षा कराई, जिसमें रीवा, सतना, जबलपुर, देवास, अजमेर, पटियाला और जोधपुर तक के छात्र शामिल हुए।1921 तक इविवि संघटक विश्वविद्यालय ही रहा। 1921 में ‘यूनिवर्सिटी ऑफ इलाहाबाद एक्ट’ पारित होने के बाद इसे आवासीय विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। 1927 से 1957 तक विश्वविद्यालय का स्वर्णिम युग रहा। इसी दौरान इसे ‘पूरब के ऑक्सफोर्ड’ का दर्जा मिला। 2005 में यह केंद्रीय विश्वविद्यालय बना और इविवि को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। 
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Prayagraj News : इविवि सीनेट हॉल के पास बदहाल फाउंटेन। - फोटो : अमर उजाला।
पांच में दो शिक्षक थे भारतीय
म्योर कॉलेज की शुरुआत पांच शिक्षकों से हुई थी, जिनमें तीन अंग्रेज और दो भारतीय शिक्षक शामिल थे। प्रो. मौलाना जकाउल्ला अरबी-फारसी के  प्रोफेसर थे और गणित भी पढ़ाते थे। वहीं, पंडित आदित्य राम भट्टाचार्य संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। 


शुरुआती दौर में इन दिग्गजों ने की पढ़ाई
म्योर कॉलेज के शुरुआती दौर में पढ़े शहर के नामचीन लोगों में पंडित मदन मोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दस टंडन, मोती लाल नेहरू, मुंशी राम प्रसाद, मुंशी अशर्फी लाल और कैलाशनाथ काटजू के नाम उल्लेखनीय हैं।

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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। सीनेट हाल। - फोटो : अमर उजाला।
23 साल पहले थम गया था विश्वविद्यालय का ‘समय’

इविवि के कला संकाय में स्थित सीनेट हॉल, लाइब्रेरी (वर्तमान प्रशासनिक ब्लॉक) और लॉ कॉलेज (वर्तमान अंग्रेजी विभाग) का निर्माण 1910 में शुरू हुआ था। इस कार्य के लिए अंग्रेजी इंजीनियर सैमुएल विस्टन जैकब को चुना गया था, जिन्होंने राजस्थान की कई बड़ी इमारतें डिजाइन कीं थीं। 1915 में 11 लाख रुपये की लागत से इमारतें बनकर तैयार हो गईं।


1912 में सीनेट हॉल का घंटाघर बनकर तैयार हुआ। इसकी घड़ी मशहूर स्विस घड़ी कंपनी जेसी बेशलर एंड संस ने बनाई थी। सीनेट हॉल के घंटाघर की मीनार हिंदू-मुगल शैली में बनाई गई थी। समय के साथ सीनेट हॉल की घड़ी भी इविवि की पहचान बन गई। सीनेट हॉल की घड़ी भी यूरोपीय वजन चालित घड़ियों की तरह हर पंद्रह मिनट में बजती थी और इसकी आवाज शहर के सात किलोमीटर के दायरे में सुनाई देती थी।


1999 तक सीनेट हॉल की यह घड़ी चलती रही। फिर अचानक खराबी आने के कारण रुक गई। इसके बाद इविवि प्रशासन ने इसे चलाने की कई असफल कोशिशें भी कीं। 2020 में इसे चलाने की कवायद शुरू की गई। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस लगाकर इसे चलाया भी गया, लेकिन यह फिर बंद हो गई।

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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय। विजयनगरम हॉल। - फोटो : अमर उजाला।
गंगा-जमुनी तहजीब का नायाब नमूना है विजयनगरम हॉल

इविवि के विज्ञान संकाय स्थित विजयनगर हॉल गंगा-जमुनी तहजीब का एक नायाब नमूना है। लंदन में तीन सितंबर 1843 को जन्मे विलियम इमरसन को 1872 में म्योर कॉलेज की इमारत की डिजाइन तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया था। इंडो-सैरासीनिक शैली में बनी ये इमारत इमरसन द्वारा निर्मित इमारतों में सबसे ज्यादा सुंदर और विस्तृत है। इतिहासकार प्रो. योगेश्वर तिवारी बताते हैं कि इस इमारत को देखकर अंग्रेजी अधिकारियों ने कहा था कि उत्तर भारत में ताज महल के बाद कोई इमारत सबसे सुंदर है तो वह म्योर कॉलेज की इमारत है। म्योर कॉलेज अब विश्वविद्यालय का विज्ञान संकाय है। विजयनगरम हॉल संगमरमर और पत्थर का बना हिंदू-मुस्लिम एवं आंगलिकि वास्तुशैली का उत्कृष्ट नूमना है।

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Prayagraj News : इलाहाबाद विश्वविद्यालय, छात्रसंघ भवन। - फोटो : अमर उजाला।
हर विभाग ने बनाई अलग पहचान
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद इसकी बागडोर अंग्रेजों के हाथ में थी। तब हर विभाग के लिए देश के कोने-कोने से विशेषज्ञ बुलाए जाते थे। दर्शनशास्त्र के प्रो. राणा डे को पूना से बुलाया गया था, प्रो. डन को अंग्रेजी विभाग और प्रो. रश ब्रूक विलियम को इतिहास विभाग की बागडोर सौंपी गई थी। इनके नेतृत्व में विभागों का संचालन किया गया और हिंदुस्तान के शीर्ष विभागों में इनकी गणना होने लगी।


क्वांटम मैकेनिक्स के पुरोधा ने स्वीकारी थी प्रोफेसरशिप
क्वांटम मौकेनिक्स के पिता कहलाने वाले इरविन श्रॉडिंजर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रोफेसरशिप स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा गया था। उन्होंने प्रोफेसरशिप स्वीकार कर ली थी, लेकिन उसी दौरान द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया और इरविन विश्वविद्यालय में ज्वाइन नहीं कर सके।


नोबेल के लिए प्रस्तावित हुए कई नाम
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तमाम शिक्षकों के नाम नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किए गए। भौतिक विज्ञान विभाग के प्रो. मेघनाथ साहा का नाम नोबेल पुरस्कार के लिए पांच बार प्रस्तावित किया गया। प्रो. केएस कृष्णन, प्रो. नील रतन धर, प्रो. के. बनर्जी के नाम भी नोबेल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किए गए थे।

विश्वविद्यालय ने देश को दिए गई दिग्गज
इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने हर क्षेत्र में देश को कई दिग्गज दिए। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर एवं वीपी सिंह और पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा इविवि के ही छात्र रहे। यूपी के पूर्व मुख्य मंत्री एनडी तिवारी, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना, कोठारी आयोग के चेयरमैन रहे एवं पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष प्रो. डीएस कोठारी, पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष सुभाष कश्यप, पूर्व सीएजी टीएन चतुर्वेदी और ढेर सारे बड़े नामों की इविवि के पुरा छात्रों में गिनती होती है।


और ‘आईएएस की फैक्ट्री’ पर भी लग गया ताला
इलाहाबाद विश्वविद्यालय कभी ‘आईएएस की फैक्ट्री’ के नाम से पहचाना जाता था। मध्यकालीन इतिहास विभाग में वर्ष ं1920-21 में आईसीएस की परीक्षा का सेंटर था। परीक्षा में शामिल होने के लिए अंग्रेजी अनिवार्य थी। परीक्षा में कुल 21 अभ्यर्थी शामिल हुए थे और इनमें से तकरीबन 15 अभ्यर्थी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के थे। पहले आईसीएस और फिर आईएएस की परीक्षा में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बड़ी संख्या में चयन होता था, लेकिन वक्त के साथ ‘आईएएस फैक्ट्री’ पर भी ग्रहण लग गया।

हर विभाग में पुस्तकालय और अंग्रेजी अनिवार्य हो - प्रो. एके श्रीवास्तव
इविवि के पुरा छात्र और इसी विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान के शिक्षक रहे प्रो. एके श्रीवास्तव ने वर्ष 1965 में विश्वविद्यालय में पहला कदम रखा था। उनका मानना है कि तब और अब के बीच आए ढेरों बदलाव विश्वविद्यालय को आगे बढ़ाने के बजाय पीछे ले गए। पहले हर विभाग में पुस्तकालय होते थे और स्नातक प्रथम वर्ष में सामान्य अंग्रेजी अनिवार्य थी। यह व्यवस्था फिर से लागू होनी चाहिए। यह वही विश्वविद्यालय है, जहां प्रो. एससी देव जैसे शिक्षक हुआ करते थे, जिन्होंने ऑक्सफोर्ड की डिक्शनरी में भी गलती ढूंढ निकाली थी।


ऑक्सफोर्ड वालों ने अपनी गलती मानी थी और उन्हें व्याख्यान के लिए अपने यहां बुलाया था।पहले हर विभाग में सोसाइटी हुआ करती थी। इनमें टीचर्स और बच्चे हुआ करते थे, जो लगातार गतिविधियों में शामिल होते थे। इसका प्रभाव छात्र की कम्युनिकेशन स्किल, उनके कॉन्फिडेंस लेवल और बॉडी लैंग्वेज पर पड़ता था। हॉस्टल की व्यवस्था में परिवर्तन भी नुकसानदायक साबित हुआ। पाठ्यक्रमवार हॉस्टल आवंटित होने से सीनियर-जूनियर की परंपरा खत्म हो रही है। हॉस्टल में रहने वाले छात्रों की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी प्रभावित हो रही है। इन सभी व्यवस्थाओं को फिर से लागू किए जाने की जरूरत है।
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इंफ्रास्ट्रक्चर की बेहतरी के लिए ग्रांट का पूरा इस्तेमाल हो - प्रो. राम किशोर शास्त्री
इलाहाबाद विश्वविद्यालय तभी आगे बढ़ सकता है, जब यहां का इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर हो और सरकार से मिलने वाली ग्रांट का पूरा इस्तेमाल हो। इविवि में संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे और तीन बार शिक्षक संघ के अध्यक्ष रह चुके प्रो. राम किशोर शास्त्री का मानना है कि जब तक इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर नहीं होगा, तब तक राह मुश्किल होगी।1972 में बतौर छात्र इविवि में प्रवेश लेने वाले प्रो. राम किशोर शास्त्री विश्वविद्यालय से 50 साल से जुड़े हुए हैं और इस दरम्यान उन्होंने बहुत कुछ बदलते देखा।


उन्हें याद है कि जब वर्ष 2008 में विश्वविद्यालय में ओबीसी आरक्षण आया था, तब 235 करोड़ रुपये के आसपास ग्रांट मिली थी और इनमें से 166 करोड़ रुपये वापस चले गए थे। इविवि को वर्ष 2005 में केंद्रीय दर्जा मिला। यहां बहुत कुछ करने को था, लेकिन वर्ष 2006-07 के बजट से 60 करोड़ रुपये वापस चले गए थे। विश्वविद्यालय को ध्यान रखना होगा कि भविष्य में इस तरह की गलतियां न दोहराई जाएं। विश्वविद्यालय प्रशासन प्रयास करे कि इसके अपने कृषि, मेडिकल एवं इंजीनियरिंग के संकाय खुलें। नए शिक्षकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए अच्छे शोध करने चाहिए।
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