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लोक संपत्ति नुकसान वसूली अध्यादेश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया जवाब तलब

Wed, 18 Mar 2020 07:57 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
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इलाहाबाद हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सार्वजनिक व निजी संपत्ति वसूली  अध्यादेश 2020 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर राज्य सरकार से 25 मार्च तक जवाब तलब किया। कोर्ट इस मामले की सुनवाई 27 मार्च को करेगी। अधिवक्ता शशांक श्री त्रिपाठी ने याचिका दाखिल कर इस संबंध में लाए गए अध्यादेश की वैधानिकता को चुनौती दी है ।

याचिका पर बुधवार को मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति समित गोपाल की पीठ ने सुनवाई की।  याची का कहना है कि अध्यादेश अवैधानिक और भारतीय संविधान की मूल भावना के विपरीत है इसलिए इसे रद्द किया जाए । याची ने अध्यादेश के तहत सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपियों से की जा रही वसूली पर रोक लगाने की मांग की थी, हालांकि कोर्ट ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ - फोटो : amar ujala
याचिका में कहा गया कि सीआरपीसी और लोक संपत्ति क्षति निवारण अधिनियम 1984 में पहले से प्रावधान मौजूद है इसके बावजूद अध्यादेश लागू करने का उद्देश्य न सिर्फ स्थापित कानूनों का अतिक्रमण करना है बल्कि हाईकोर्ट द्वारा आठ मार्च को पोस्टर हटाने के संबंध में दिए निर्णय को ओवर रूल करना है।

राज्य सरकार की ओर से उपस्थित महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह ने याचिका की  पोषणीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अध्यादेश को याचिका के माध्यम से चुनौती नहीं दी जा सकती है। इसमें चुनौती देने का कोई आधार नहीं बताया गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में अध्यादेश लागू कर दंगों और प्रदर्शनों के दौरान सार्वजनिक  व निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों से नुकसान की वसूली का कानून लागू किया है।
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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ। - फोटो : amar ujala
अध्यादेश के तहत एक अधिकरण की स्थापना की जाएगी तथा नुकसान के आकलन के लिए एक समिति बनाई जाएगी, जिसमें हाईकोर्ट या जिला जज स्तर के रिटायर्ड जज शामिल हो सकते हैं। कमेटी नुकसान का आकलन कर अधिकरण को रिपोर्ट देगी और उसके आधार पर नुकसान की वसूली की जा सकेगी ।

अध्यादेश में यह भी प्रावधान है कि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोपियों के फोटो तथा विवरण सार्वजनिक किए जा सकेंगे। इसी संबंध में गत  आठ मार्च को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार  से लखनऊ में आरोपियों के पोस्टर हटाने का इस आधार पर निर्देश दिया था की सरकार द्वारा की गई कार्यवाही किसी कानून के दायरे में नहीं आती है।

इसके बाद प्रदेश सरकार ने अध्यादेश लाकर यह कानून लागू किया है। याची का कहना है कि प्रदेश सरकार द्वारा लाया गया अध्यादेश निजता के अधिकार का हनन करता है। अधिकरण में न्यायिक सदस्यों को स्थान नहीं दिया गया है।  याचिका पर 27 मार्च को अगली सुनवाई होगी।
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