बटेश्वर पशु मेले से पशु लेकर लौट रहे किसान
- फोटो : अमर उजाला
आगरा के बटेश्वर का बैल मेला मुंशी प्रेमचंद की कहानी में सिमट कर रह गया है। पिछली साल की तरह इस साल भी बटेश्वर में बैलों का मेला नहीं लगा। बैल लेकर पहुंचे किसान बोले कि उत्तर भारत के प्रमुख मेलों में शुमार बैलों का यह मेला अब इतिहास के पन्नों में सिमट गया है।
मुंशी प्रेमचंद की कहानी पंचपरमेश्वर में उन्होंने लिखा है कि अलगू चौधरी ने बटेसर मेले से दो बैल खरीदे थे। वही ख्यातिलब्ध बैलों का मेला अब समय के साथ खात्मे की कगार पर है। उत्तर भारत के प्रमुख मेलों में शामिल बटेश्वर मेले में पिछले साल भी बैलों की खरीद फरोख्त नहीं हुई थी।
इस साल भी बैलों का मेला नहीं लगा। एटा के पिपरिया गांव के रामनाथ, राम प्रसाद, ओमवीर, ब्रजेश, बहादुरपुर के मुकेश, भूरे, रविंद्र सिंह आदि कुछ लोग 25 अक्तूबर को बैल खरीदने को पहुंचे थे। पर, मेले में बैल नहीं मिले तो वापस लौट गए। उन्होंने जिला पंचायत की बेरूखी और बदइंतजामी को मेला उजड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया।
खरीददार न मिलने पर लौटे किसान
बाद में बैल लेकर पहुंचे फिरोजाबाद के उरावर गांव के अनीश, सचिन, अरविंद, रामपाल, बाकलपुर के रूप सिंह, लहररू के विजेंद्र, श्याम सिंह, सोरों के रामकिशोर, विमलेश को मेले में कोई खरीददार नहीं मिला। मजबूरी में वे भी बैल लेकर वापस लौटे। उन्होंने बताया कि बैलों का मेला 7-8 दिन लगता था।
जिला पंचायत की अनदेखी से मेला इतिहास में सिमट गया है। मेले से जुड़ी यादों को साझा करते हुए उन्होंने दुख जताया। वहीं मेला प्रभारी अमित प्रताप सिंह बैलों का मेला न लगने का कारण कृषि का यंत्रीकरण होना मानते हैं।
जिला पंचायत की अनदेखी से मेला इतिहास में सिमट गया है। मेले से जुड़ी यादों को साझा करते हुए उन्होंने दुख जताया। वहीं मेला प्रभारी अमित प्रताप सिंह बैलों का मेला न लगने का कारण कृषि का यंत्रीकरण होना मानते हैं।