आगरा के अछनेरा के गांव तुरकिया में 12 साल पहले पूरे परिवार का कत्ल कर दिया गया। दंपती के साथ चार मासूम बच्चों को भी कुल्हाड़ी से काट डाला। इस हत्याकांड की वजह क्या रही, ये पुलिस की विवेचना में साबित नहीं हो सका।
आगरा में 12 वर्ष पहले हुए सामूहिक हत्याकांड में सजा पाने वाले गंभीर सिंह सुप्रीम कोर्ट से बरी हो गया। वह केंद्रीय कारागार में निरुद्ध है। कोर्ट का आदेश मिलने के बाद कारागार प्रशासन उसकी रिहाई की प्रक्रिया आरंभ करेगा।
गंभीर सिंह केंद्रीय कारागार के सर्किल नंबर तीन की बैरक में रखा गया है। जिसमें उसके साथ 80 से अधिक बंदी हैं। जेल प्रशासन से मिली जानकारी के मुताबिक, वह साथी बंदियों से अधिक घुलामिला नहीं है। उनसे कम ही बातचीत करता है। हालांकि कारागार प्रशासन के रिकाॅर्ड में उसका व्यवहार संतोषजनक है। वरिष्ठ अधीक्षक ओपी कटियार ने बताया कि गंभीर की रिहाई का आदेश अभी नहीं मिला है। आदेश मिलने के बाद प्रक्रिया आरंभ की जाएगी। इसे आगरा की कोर्ट भेजा जाएगा। आदेश मिलने आगे की कार्रवाई की जाएगी।
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तुरकिया हत्याकांड:
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पुलिस पलट रही रजिस्टर के पन्ने
हत्याकांड में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद थाना अछनेरा पुलिस ने पुराने रजिस्टरों को खंगाला। केस के संबंध में जानकारी ली। पूर्व में हुई सत्यभान की मां की हत्या के केस की भी जानकारी जुटाई। डीसीपी पश्चिमी जोन सोनम कुमार ने बताया कि केस में वादी की ओर से रिव्यू पिटीशन दाखिल करने की तैयारी है। इसमें 1 महीने का समय होता है। अगर, वादी पक्ष की ओर से सुरक्षा की मांग की जाएगी तो दी जाएगी। जिस पर आरोप लगाएंगे, उसे पाबंद भी किया जाएगा।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
हत्या की वजह न साबित कर सकी पुलिस की विवेचना
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2012 में हुए तुरकिया हत्याकांड में सजा पाए गंभीर सिंह को बरी कर दिया। आदेश में अभियोजन पक्ष के मामले में बहुत सी खामियां बताई हैं। विशेष बात यह रही कि जहां हत्या का कारण साबित नहीं हो सका, वहीं बरामदगी और गवाह भी ठोस नहीं मिल सके।
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तुरकिया हत्याकांड
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तथ्य- 1
विवेचक ने अपनी विवेचना में गांव के एक व्यक्ति को गवाह बनाया। उन्होंने बयान दिया कि वह घटना की जानकारी पर सत्यभान के घर पहुंचे थे। तब हत्या का पता चला। इस दाैरान पुलिस को बताया कि गंभीर सिंह, उसकी बहन गायत्री और नाबालिग को जाते हुए देखा था। गंभीर के कपड़ों पर खून लगा हुआ था। मगर, उन्होंने टोका नहीं है। खून लगा होने के बारे में नहीं पूछा। उन्होंने पुलिस को भी नहीं बताया। इस गवाही पर हत्यारोपी नहीं माना जा सका।
तथ्य- 2
पुलिस ने जमीन के विवाद में पहले मां की हत्या, फिर भाई और उसके परिवार की हत्या बताया, जबकि पुलिस यह साबित नहीं कर सकी कि सत्यभान की जमीन थी या किसी और की। जमीन विवाद से संबंधित कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह पता चल जाता कि हत्या इसी विवाद में की गई है।
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तुरकिया हत्याकांड
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
तथ्य - 3
पुलिस ने कुल्हाड़ी, कुंडल और खून से सने कपड़े बरामद किए थे। इन कपड़ों की बरामदगी में किसी स्वतंत्र गवाह की गवाही नहीं कराई। कपड़ों पर खून लगा दर्शाया गया, वह किस ब्लड ग्रुप का था, यह नहीं पता चला। घर में पड़े मिले मृतकों के खून से मिलान नहीं कराया गया।
तथ्य - 4
पुलिस ने सिर्फ गवाही ली। गवाह भी वादी पक्ष का परिचित था। इसके अलावा मृतक के घर के आसपास के लोगों के कोई बयान नहीं लिए गए। इस मामले में ठोस गवाह प्रस्तुत नहीं किए गए। इसका लाभ गंभीर सिंह को मिला।
पुलिस की विवेचना में लापरवाही का मिला फायदा
अधिवक्ता अनूप सिंह ने बताया कि किसी भी हत्या के मामले में कारण का होना जरूरी होता है। मगर, इस मामले में पुलिस कारण साबित नहीं कर सकी। गवाह और साक्ष्य बरामदगी में भी पुलिस ने लापरवाही की। इस कारण ही सजायाफ्ता बरी हो गया।