रात को ड्राइविंग करते समय चालक को आई झपकी ने जिले में पांच साल के भीतर 2300 लोगों की जान ले ली है। 705 लोगों की मौत यमुना एक्सप्रेसवे पर ही हो गई। जबकि आगरा-दिल्ली हाईवे पर भी 1606 लोगों की जान चली गई है। पिछले साल भरतपुर मार्ग पर ही चालक को आई झपकी में एक ही परिवार के दस लोगों की मौत हो गई थी।
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क्षतिग्रस्त कार
- फोटो : अमर उजाला
नोएडा से आगरा तक के यमुना एक्सप्रेसवे पर अधिकांश हादसे रात के ही वक्त हो रहे हैं। रात को भी डेढ़ बजे से तड़के चार बजे के बीच। यह वक्त नींद आने का होता है और लंबा सफर तय करने वाले ड्राइवरों को कहीं न कहीं नींद की झपकी आ जाती है और गाड़ी आगे जा रहे किसी वाहन से टकरा जाती है। डिवाइडर से टकराकर भी वाहन पलट जाते हैं।
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घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया
- फोटो : अमर उजाला
अगर यमुना एक्सप्रेसवे अथारिटी के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो 2012 से 2017 तक नोएडा से आगरा के बीच हादसों में 705 लोगों की मौत हो गई, जबकि दो हजार 65 लोग घायल हो गए हैं। अधिकांश हादसे आधी रात के बाद के हैं। आगरा-दिल्ली हाईवे पर अकेले फरह थाना क्षेत्र में ही पांच साल के भीतर 286 लोगों की जान चली गई, जबकि 400 घायल हो गए।
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क्षतिग्रस्त कार
- फोटो : अमर उजाला
वहीं एक्सीडेंट जोन बने कोसीकलां में 256, जैंत में 220, छाता में 289, रिफाइनरी में 290 और हाईवे थाना क्षेत्र में 265 की मौत हो गई। हाईवे पर भी अधिकांश हादसे रात को एक बजे से सुबह चार बजे के बीच हुए हैं। ज्यादातर में तेज रफ्तार वाहन आगे चल रहे किसी वाहन से टकराए हैं। खराब खड़े ट्रक या फिर ट्रैक्टर ट्राली से भी वाहन टकराए हैं।
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घायल डॉक्टर
- फोटो : अमर उजाला
यमुना एक्सप्रेसवे पर वाहनों की रफ्तार का मानक 100 किलोमीटर प्रति घंटा है, लेकिन गाड़ियां 150 किलोमीटर की रफ्तार से दौड़ रही हैं। हर रोज एक हजार वाहन ओवरस्पीड कर रहे हैं। यह संख्या तो वह है जो स्पीड कैमरों में दर्ज हो रही है। वरना संख्या इससे भी कहीं ज्यादा हैं।
एक्सप्रेसवे और हाईवे पर दौड़ने वाले सरिया और पाइप लदे वाहनों से सबसे ज्यादा हादसे हो रहे हैं। ट्रक से सरिया वाहन निकला होता है।तेज रफ्तार आने वाली गाड़ी को ट्रक नजर आता नहीं और अचानक घुस जाती हैं। जिससे लोग सरियों और पाइप से टकराकर मर जाते हैं।