मुकद्दस रमजान मजहबों के बीच की दीवार को भी मिटा देता है। इस पाक महीने में दरगाह शेख फतिहउद्दीन शाह बल्खी (मरकज साबरी) से जुड़े हिंदू भी रोजे रखते हैं। यह सिलसिला कई साल से चल रहा है। दरगाह के सचिव विजय कुमार जैन भी बरसों से दरगाह से जुड़े हुए हैं और सेवादारी करते हैं।
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मरकज साबरी दरगाह से जुड़े हिंदू परिवार
- फोटो : अमर उजाला
बहुत सालों से दरगाह मरकज साबरी से जुड़े हुए हैं। दरगाह में पहुंचकर हर मुराद पूरी होती है। इस मुश्किल वक्त में कैसे दामन छोड़ सकते हैं। पांच साल से रोजे रखती हूं। इस बार कोरोना के खात्मे की दुआ रोजाना तरावीह के बाद करती हूं। - माया देवी साबरी, नगला पदी, न्यू आगरा
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दरगाह मरकज साबरी
- फोटो : अमर उजाला
रोजे रखने की शुरुआत कब हुई पता नहीं चला। अब हर साल रमजान का इंतजार रहता है। ये माह रोजे रखकर इबादत करने में गुजरता है, किसी तरह से किसी के बारे में गलत सोचना भी गुनाह माना जाता है। इस दफा घर पर ही रोजे रखे हुए हैं। -आशीष साबरी, लश्करपुर
दरगाह मरकज साबरी में रोजाना आना जाना हुआ। यहां पहुंचकर लगता ही नहीं कि किसी अलग जगह आ गए हैं। रोजे रखने से रुहानी ताकत मिलती है। अब रोजे रखते हैं। दरगाह पर जाना लाकडाउन में फिलहाल बंद है। -जयसिंह साबरी, न्यू आगरा
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दरगाह मरकज साबरी आगरा क्लब
- फोटो : अमर उजाला
आस्था तो ऊपर वाले पर है। नाम और तरीका अलग हैं। पूजा करते हैं और रमजान में रोजे भी रखते हैं। खुदा के दरबार में भेदभाव नहीं है तो इंसान भेदभाव क्यों करें। आजकल हालात अलग हैं मगर ठीक होगा। यह उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए। - गायत्री देवी साबरी, शाहगंज
दरगाह में सजदा करने जाते हैं। हर बृहस्पतिवार को तो जाना होता ही है। ऐसे में रोजा रखना भी सीख गए। रोजे रखने के लिए बहुत परहेज करने पड़ते हैं, लेकिन इबादत करने से बेहतर कुछ नहीं है। घर में पूजा भी होती है। हम रोजा भी रखते हैं। -शिवानी साबरी, रामनगर पुलिया, शाहगंज