छतों पर बैठे नंदगांव के ग्वालों ने टेसू के फूलों के रंग से बरसाना के हुरियारों को सराबोर कर दिया। गुलाब की पंखुड़ियों से उनका जोरदार स्वागत किया। जगह-जगह रंगोली सजाई गई। तमाम परंपरागत रीति-रिवाजों के बाद यहां लठामार होली शुरू हुई।
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हुरियारों पर लठ से प्रहार करतीं हुरियारिन
- फोटो : अमर उजाला
भंग की तरंग में मदमस्त बरसाना के हुरियारे हंसी-ठिठोली करते हुए शनिवार को नंदभवन पहुंचे, तो यहां पहले से छतों पर बैठे नंदगांव के ग्वालों ने पिचकारी, बाल्टियों से टेसू के फूलों के रंग से उनको सराबोर कर दिया। चारों ओर नंदभवन में विभिन्न रंगों की सतरंगी छटा छा गई। कृष्ण-बलराम के विग्रहों के समक्ष समाज गायन चंदा छिपमत जईयौ आज, श्याम संग होरी खेलूंगी आदि पर हुरियारिनों ने नृत्य किया। इसी के साथ यहां लठामार होली का दौर शुरू हो गया।
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नंदगांव की हुरियारिन और ढाल लेकर होली खेलता नन्हा हुरियारा
- फोटो : अमर उजाला
बरसाना से दोपहर करीब दो बजे राधारानी सखी स्वरूप हुरियारों का आगमन नंदगांव में शुरू हो गया। यशोदा कुंड पर चकाचक रबड़ी, केसर युक्त भांग ठंडाई छानी गई। नंदगांव के लोगों ने उनका भव्य स्वागत सत्कार किया। सिर पर पगड़ी बांध ढालों के साथ कुंड से बाहर निकलकर नंद के जमाई की जय के गगनभेदी जयघोष करते हुए नंदभवन की ओर कूच करते हैं। गुलाब की पंखुड़ियों से उनका जोरदार स्वागत किया। जगह-जगह रंगोली सजाई गई।
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नंदभवन में हुरियारे
- फोटो : अमर उजाला
छतों पर ड्रमों में भरा टेसू के फूलों का प्राकृतिक रंग हुरियारों पर बरसाया जाने लगा। होली के अद्वितीय प्रेम के इस रंग में सराबोर होने के लिए श्रद्धालु भी मचलने लगे। लहंगा चुन्नी और सोलह शृंगार से सजी-धजी हुरियारिनें अपने घर के द्वार, अटा अटरियाओं के झरोखों से झांकने लगीं तो हुरियारों के झुंड के झुंड हुरियारिनों से इशारा करके कहते हैं कि दर्शन दै निकस अटा में ते दर्शन दै। इस तरह भंग की तरंग में मदमस्त हुरियारे हंसी-ठिठोली करते हुए नंदभवन पहुंचे।
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नंदगांव की हुरियारिनों के पैर छूते नन्हे हुरियारे
- फोटो : अमर उजाला
बरसाना के हुरियारों को टेसू के फूलों के रंग से सराबोर कर दिया। चारों ओर नंदभवन में विभिन्न रंगों की सतरंगी छटा छा गई। यहां संयुक्त समाज गायन किया गया। इसमें बरसाने की गोपी फगुवा मांगन आईं, कियौ जुहार नंद जू कौं भीतर भवन बलाईं। फगुवा मिस ब्रज सुंदरी जसुमति ग्रह आईं, तब ब्रजरानी बोल कैं रावर में लीनी आदि पदों का गायन नृत्य किया। इस तरह तमाम परंपरागत रीति-रिवाजों के बाद यहां लठामार होली शुरू होती है। प्रेम भरी लाठियों की बरसात हुरियारों पर हुरियारिन करने लगती हैं।
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नंदगांव के हुरियारे
- फोटो : अमर उजाला
मान्यता है कि द्वापर में जब फागुन सुदी नवमी को भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ होली के बाद बिना कोई फगुवा (उपहार) दिए बरसाना से नंदगांव आ गए थे तो बरसाना में सभी गोप-गोपियों ने बैठक की। इसमें निर्णय लिया कि फगुवा लेने के लिए नंदगांव नंदभवन चलना चाहिए। अगले दिन दशमी को बरसाना के गोपी ग्वाल जुर मिल कर फगुवा लेने के लिए नंदभवन आते हैं। यहां द्वार पर खडे़ होकर कहती हैं फगुवा दै मोहन मतवारे फगुवा दै। फगुवा के बहाने एक बार फिर नंद के गांव में होली होती है। फाग महोत्सव की इसी लीला को साकार करने के लिए बरसाना के बाद नंदगांव में लठामार होली का आयोजन शनिवार को किया गया।
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नंदगांव में होली की मस्ती में नाचती युवतियां
- फोटो : अमर उजाला
लठामार होली समापन के पश्चात हुरियारिन नंदबाबा मंदिर पहुंचीं। यहां नंद परिवार के दर्शन किए। इसके बाद घर पहुंचने पर सास, ननद, ससुर, पति एवं बडे़ बुजुर्गों के पैर छूकर आशीर्वाद लिया। वहीं, लठामार होली से पहले हुरियारिनों ने पूरी तरह से शृंगार किया। रात में मेहंदी लगाई। लाठियों को एक बार फिर तेल पिलाया गया। उन्हें सुंदर बनाया गया। इधर, लठामार होली के समापन के बाद रात में जगह-जगह होली रसियाओं का आयोजन हुआ। हर चौक पर महफिल सजाई गईं। रसियाओं की धुनों पर मदमस्त होकर नृत्य किया।
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नौहझील में लठामार होली
- फोटो : अमर उजाला
एक तो कृष्ण का गांव उस पर भी फाल्गुन महोत्सव। भला ऐसे अवसर को कौन छोड़ सकता है। दूरदराज से आए हजारों श्रद्धालुओं ने नंदगांव की परिक्रमा की। इस दौरान श्रीकृष्ण के लीला स्थलों के जी भर कर दर्शन किए। गोपियों ने जैसे ही उछल-उछल कर लाठियों से प्रहार करना शुरू किया वैसे ही हुरियारों ने भी अपने करतब दिखाना शुरू कर दिया। हुरियारिन उछल कर लाठियां मारतीं तो हुरियारे मयूरी नृत्य कर लाठियों के प्रहारों को रोकते। मयूरी नृत्य की फिरकनी से हुरियारिनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।
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Lathmar Holi 2022
- फोटो : iStock
फाग महोत्सव ब्रज में सबसे अधिक समय तक मनाए जाने वाला उत्सव है। यह श्रीराधाकृष्ण का अनुराग युक्त प्रेम का प्रतीक है। मान्यता है कि द्वापर में जब कृष्ण और उनके सखा राधा और उनकी सखियों से होली खेलने बरसाना जाते थे तो होली खेलते हुए राधा और उनकी सखियां फूलों से सुसज्ज्ति छड़ियों से कृष्ण और उनके सखाओं को भगाती थीं। उन छड़ियों के प्रहारों को कृष्ण और उनके सखा सोने की पिचकारियों से रोकते थे। बरसाना की होली में अब कनक पिचकारियों का स्थान ढालों ने और पुष्प जड़ित छड़ियों का स्थान बांस की मोटी-मोटी लाठियों ने ले लिया है। ढाल और लाठियों के चलन वाली होली लगभग 6 दशक पुरानी बताई जाती है। यह होली अबला कही जाने वाली महिलाओं को सबला बनाने का प्रशिक्षण भी है।
रंगोत्सव-2022 के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। इस दौरान राजस्थान, हरियाणा एवं अन्य प्रदेशों के कलाकारों ने कार्यक्रम प्रस्तुत किए। बहुरुपियों द्वारा चार्ली चैपलिन सहित तमाम झांकियां आकर्षण का केंद्र रहीं। लोगों में झांकियों के साथ सेल्फी लेने का क्रेज दिखा। नगाड़ों की थाप और बीन पर श्रद्धालु थिरकते दिखे।