वर्ष 1952 में पहले आम चुनाव हुए। तब से अब तक 68 साल हो गए। विकास के दावे तमाम हैं लेकिन बीहड़ में ये दावे दम तोड़ जाते हैं। यहां अभी भी कई गांव हैं, जहां सड़क नहीं है। नदियों पर पुल नहीं हैं। बरसात में इन रास्तों पर पानी भर जाता है। जिंदगी गांव में कैद हो जाती है। बीहड़ में बसा आगरा के बाह की यह तस्वीरें सच बयां कर रही हैं।
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बीहड़ में हैं ऐसी पगडंडियां
- फोटो : अमर उजाला
रास्ता बंद था, उपचार नहीं मिला, 12 लोग मर चुके
यमुना तराई में बसे बाह के सुंसार, बाग गुढ़ियाना और बुढैरा गांव हो या चंबल के बीहड़ में बसे मऊ की मढै़या, पुरा डाल और गुढ़ा गांव। यहां बीहड़ की पगडंडी पर जिंदगी हांफ जाती है। तीन साल में इलाज के अभाव में सुंसार गांव में 12 लोगों की जान जा चुकी है। पिछले साल माधौ सिंह की पत्नी सरोज को रात में प्रसव पीड़ा हुई। इलाज को ले जाते समय रास्ते में जच्चा-बच्चा की मौत हो गई। डेढ़ साल पहले सालभर के आकाश पुत्र भूपाल सिंह की रास्ते में इलाज को ले जाते समय जान चली गई थी।
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नाव से यमुना नदी पार करते लोग
- फोटो : अमर उजाला
यहां नाव के सहारे जिंदगानी
फतेहपुर सीकरी लोकसभा क्षेत्र में बाह के दो गांव कलियानपुर भरतार और विक्रमपुर के लोगों की जिंदगानी नाव के भरोसे है। लोग घर से खेतों तक पहुंचने के लिए नाव से यमुना नदी पार करते हैं। कलियानपुर भरतार में तो मतदान के लिए पोलिंग पार्टियां भी नाव से ही यमुना पार कर पहुंचती है। दो नावों से यहां की आबादी घर तक आती जाती है। दोनों गांवों के तीन सिरों पर यमुना नदी है तो चौथे सिरे पर बीहड़ है। मतलब साफ है कि बच्चों को पढ़ाने और बीमार को इलाज के लिए यमुना पार करने को नाव का सहारा लेना पड़ता है। बाजार भी नाव के भरोसे होता है। बच्चों की शादी के लिए या तो गांव छोड़ना पड़ता है या नाव से बरात आती है।
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बटेश्वर में नाव से यमुना पार करते लोग
- फोटो : अमर उजाला
बटेश्वर में गुजारनी पड़ती है रात
गांव का कोई रिश्तेदार सांझ ढले बटेश्वर पहुंचे तो उसे यमुना पार करने के लिए सुबह का इंतजार करना पड़ता है। रात के वक्त यमुना में नाव नहीं चलती हैं। देर से पहुंचने वाले लोगों को बटेश्वर की मंदिर शृंखला के आंचल में रात गुजारनी पड़ती है।
बीच में ही छूट जाती है बेटियों की पढ़ाई
गांव में 8वीं की पढ़ाई के बाद अधिकांश बेटियों का हाईस्कूल और उससे आगे पढ़ने का सपना महज इसलिए टूट जाता है कि आने जाने के लिए नाव के अलावा कोई साधन नहीं है। गांव में पढ़ाने को जाने वाले शिक्षक शिक्षिकाएं भी नाव से नदी पार कर स्कूल पहुंचते हैं।