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Kargil Vijay Diwas 2020: ग्लेशियर की पोस्ट कब्जा कर भारतीय सैनिकों ने मनाई थी ईद, पढ़ें रणबांकुरों की वीरगाथा

Sun, 26 Jul 2020 12:28 PM IST
मुकेश कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा
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कारगिल विजय दिवस: शहीद कैप्टन हनीफ उद्दीन की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
कारगिल के ग्लेशियर में पाकिस्तान के जबड़े से पोस्ट को छीनकर भारतीय सैनिकों ने ईद मनाई थी। दुर्गम दुर्मुख पोस्ट को जीतने की जंग में कैप्टन हनीफ उद्दीन समेत तीन जवान शहीद हुए थे। तब से दुर्मुख पोस्ट का नाम बदल कर कैप्टन हनीफ उद्दीन एरिया हो गया। कारगिल विजय दिवस के अवसर पर इस जंग के हीरो रहे आगरा जनपद के गांव रुदमुली निवासी हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया ने यह वीरगाथा सुनाई। हवलदार भदौरिया जुलाई 2002 से जुलाई 2003 तक यूएन मिशन पर शांति बहाली के लिए इथोपिया में रहे। 
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कारगिल विजय दिवस: हवलदार नीवेन्द्र भदौरिया की फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला
हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि युद्ध के समय ग्लेशियर में सांस जमा देने वाले वाले हालात थे। दुर्गम चोटी पर उनकी यूनिट चढ़ गई थी। ईद का दिन था। दोपहर को ग्रेनेड से पाक टीम के बंकर पर हमला बोला था। जिस पर पाक सैनिक भाग खडे़ हुए। उसके बाद भारतीय सैनिकों ने उनके ही हथियारों से गोलीबारी की और पोस्ट पर कब्जा जमाकर तिरंगा फहराकर ईद मनाई। 

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कारगिल विजय दिवस
पाक कब्जे से दुर्मुख चोटी को छीनने की जंग कैप्टन हनीफ के नेतृत्व में लड़ी गई थी। दुर्मुख इलाके को जीतने के बाद कैप्टन हनीफ समेत तीन जवान शहीद हो गए थे। कैप्टन हनीफ की शहादत के सम्मान में दुर्मुख का नया नाम कैप्टन हनीफ एरिया रख दिया गया। 2004 में सेवानिवृत्त हुए नीवेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि कारगिल जंग की जीत का हर लम्हा आंखों के सामने आते ही सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।  

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कारगिल विजय दिवस: हवलदार नीवेन्द्र भदौरिया - फोटो : अमर उजाला
बिग्रेडियर समीर भदौरिया, हवलदार नीवेंद्र सिंह भदौरिया समेत रुदमुली के सात रणबांकुरे कारगिल जंग में लडे़ थे। इससे पूर्व पहले विश्व युद्ध में बाह क्षेत्र के 82 सपूतों ने भाग लिया। छह शहीद हुए। दूसरे विश्व युद्ध में 90 जवान शामिल हुए थे। चार शहीद हुए। 1947-48 के कश्मीर युद्ध में 52 में से दो जवान शहीद हुए थे। 1962 में रघुवीर सिंह, 1965 में बृजराज सिंह, 1971 में जसकरन सिंह शहीद हुए। 
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कारगिल विजय दिवस: रुदमुली में शहीद स्मारक - फोटो : अमर उजाला
गांव रुदमुली के लोगों ने शहीद स्मारक बनवाकर उनकी यादों को सहेजा है, लेकिन सरकार गांव रुदमुली को पहचान दिलाने के लिए शहीद द्वार तक नहीं बनवा सकी है। साथ ही यहां पर बरसों से हो रही सैनिक ट्रेनिंग सेंटर खोले जाने का सपना भी अब तक पूरा नहीं हो सका है। त्याग और बलिदान के बदले में वीरों की भूमि रुदमुली को क्या मिला ? यह सवाल गांव के हर गली और घर में उठ रहा है। 
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कारगिल विजय दिवस: शहीद धर्मवीर सिंह स्मारक - फोटो : अमर उजाला
कारगिल की जंग में चार दुश्मनों को मौत के घाट उतारने के बाद 30 मई 1999 को शहीद हुए खंदौली के गांव मलूपुर के सिपाही धर्मवीर सिंह की शहादत पर पूरे गांव को गर्व है। धर्मवीर सिंह चार बहनों और दो भाइयों में सबसे बड़े थे। बेटे धर्मवीर सिंह की शहादत के बाद मां श्रीमती पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। बाद में करंट लगने से छोटा बेटा रवि की भी मौत हो गई थी। सरकार ने श्रीमती को आजीविका चलाने के लिए खेत और पैसा दिया साथ ही एक पेट्रोल पंप भी आवंटन हुआ। श्रीमती अब पेट्रोल पंप को संभाल रही है। परिवार के लोग गांव में बने स्मारक की सफाई करते हैं। मां श्रीमती तीज त्योहार पर शहीद बेटे को भोग लगाती हैं।
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