फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: आगरा की ये महिलाएं हैं संघर्ष, शक्ति और संकल्प की मिसाल, इनके सिर पर ताज

Tue, 08 Mar 2022 10:19 AM IST
मुकेश कुमार अमर उजाला ब्यूरो, आगरा
विज्ञापन
1 of 9
महिला दिवस: आगरा की शक्ति - फोटो : अमर उजाला
समाज को दिशा देने में महिलाओं की भूमिका किसी भी तरह से कभी कम नहीं है। ये संघर्ष, शक्ति और संकल्प का प्रतीक है। मुसीबत पड़ने पर भी इन्होंने कभी हार नहीं मानी और अपनी अटूट इच्छाशक्ति से इसका डटकर सामना किया। कड़े संघर्ष से अपनी सफलता पर निशाना साधा। आइए जानते हैं आगरा की कुछ ऐसी ही नारी शक्ति के बारे में।

आगरा की रेनू बंसल की कहानी दिल को झकझोर देने वाली है। कोरोना की दूसरी लहर में जब मरीजों की सांसों पर संकट था, तब रेनू बंसल पति को सांसें देने के लिए अपनी जान पर खेल गई थीं। इन्होंने ऑक्सीजन के लिए तड़पते पति को मुंह से सांस देकर जान बचाने का प्रयास किया था। पति ने उनकी गोद में दम तोड़ दिया था। रेनू बंसल की इस तस्वीर ने लोगों का दिल झकझोर दिया था। 
विज्ञापन

2 of 9
पति को सांस देने का प्रयास करतीं रेनू बंसल (फाइल) - फोटो : अमर उजाला

आज की सावित्री हैं रेनू बंसल

रेनू ने बताया कि 23 अप्रैल को पति की मृत्यु हुए एक साल हो जाएगा। आज तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली। भाई के मकान में किराये पर रहती हैं। पति की मृत्यु के बाद भाई ने किराया लेना बंद कर दिया। उल्टा, मेरी आर्थिक मदद करता है। कुछ मदद बहनोई से मिल जाती है। रिश्तेदारों का ही अब तो सहारा है। रेनू ने बताया कि बेटी की पढ़ाई छूट गई। इस बार 11वीं कक्षा की परीक्षा प्राइवेट फॉर्म भरा है। पति पेठा व्यवसायी थे। अब बेटी को कहीं नौकरी मिल जाए तो उसके सहारे ही मेरा जीवन कट जाएगा। 
विज्ञापन

3 of 9
राटौटी गांव की किसान मलुआ देवी - फोटो : अमर उजाला

खेतों में पसीना बहाकर महकाई परिवार की बगिया

शादी के छह साल बाद पति के बीमार होने के बाद दुख का पहाड़ टूटने पर राटौटी गांव की मलुआ देवी (50) ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने खेतों में पसीना बहाकर अपने परिवार की बगिया दिल्ली के चांदनी चौक तक महका दी है। उनके मानसिक रूप से बीमार पति की हालत पहले से बेहतर है। कामकाज में हाथ बटाने लगे हैं। बेटे गौरव और सौरभ को दिल्ली के चांदनी चौक में रेस्टोरेंट खुलवा दिया।  कठिन दौर में हिम्मत हारने वाली आसपास की महिलाओं के लिए मलुआ देवी प्रेरणा का पुंज बनी हुई है। दुख के दिनों में आसपास की महिलाओं को यह कहकर हौसला देती है, कि मुझे देखों और आगे बढ़ो। 

4 of 9
कॉर्फबॉल खिलाड़ी रीना सिंह - फोटो : अमर उजाला

रीना सिंह ने चुनौतियों का सामना कर संभाली इंडियन कॉर्फबॉल की कमान

इंडियन कॉर्फबॉल टीम की कप्तान रह चुकी नगला पदी की रहने वाली रीना सिंह को खेल के दौरान समाज की कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कई लोग पिता सोबरन सिंह और भाई गिर्राज सिंह से कहते थे कि बेटी लड़कों के साथ खेलती है। खिलाड़ियों से कोई शादी नहीं करता है। रीना और उनके परिवार ने समाज की परवाह किए बिना एक अलग मुकाम हासिल किया। वह तीन वर्ल्ड कप खेलने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी। 43 साल की रीना वर्तमान में महिलाओं के लिए विभिन्न क्षेत्र में काम भी कर रहीं हैं। 
विज्ञापन

5 of 9
एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट थाना की प्रभारी निरीक्षक कमर सुल्ताना - फोटो : अमर उजाला

600 जोड़ों का बसाया घर, 13 बाल विवाह रुकवाए

एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट थाना की प्रभारी निरीक्षक कमर सुल्ताना 17 साल से पुलिस में विभाग में अपनी सेवाएं दे रही हैं। वे अब तक परिवार परामर्श केंद्र में 600 जोड़ो का समझौता करा चुकी हैं और 13 बाल विवाह रुकवाने के अलावा 54 लड़कियों को वैश्यावृत्ति से मुक्त कराया है। इनमें से 25 को रोजगार भी दिलाया है। 

सुल्ताना ने बताया कि वह पुलिस में आने के बाद से ही महिलाओं लिए काम कर रही हैं। उनके काम के लिए मिशन शक्ति अभियान के लिए उन्हें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सम्मानित भी किया है। उन्होंने बताया कि उनके लिए भी यह सफर करना आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में पिता समाज के डर से उन्हें रोकते थे, लेकिन दादा रियाद हुसैन और शादी के बाद पति इकबाल हुसैन ने उन्हें हमेशा प्रोत्साहित किया। अपनी मेहनत और ईमानदारी से आज वे महिलाओं के लिए मिसाल बनी हैं।
विज्ञापन

6 of 9
एसओ इतुल चौधरी - फोटो : अमर उजाला

वर्दी में करती हैं समाज सेवा

बुलंद हौसले रखने वाली मूल रूप से बिजनौर की रहने वाली महिला थाने की एसओ इतुल चौधरी 25 साल से पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दे रहीं हैं। उन्होंने बताया कि वे पुलिस में रहकर समाज के लिए कुछ करना चाहती थी। इसलिए उन्होंने पुलिस की नौकरी का चयन किया। 19 साल की उम्र में दारोगा के पद तैनाती मिलने के बाद वे गाजियाबाद, हाथरस आदि शहरों में अपनी सेवाएं देने के बाद पांच साल से आगरा में हैं। 

यहां इतुल चौधरी लोहामंड़ी, ताजगंज आदि थानों में तैनात रहीं। 23 अक्तूबर 2021 से महिला थाना में थानाध्यक्ष हैं। इतुल का कहना है कि वर्दी पहने के बाद समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ऐसे में जब लोग घरों में त्योहार मना रहे होते हैं तब बच्चे हमारा घर पर इंतजार करते हैं और हम अपनी ड्यूटी कर रहे होते हैं। 
विज्ञापन

7 of 9
डॉक्टर सरोज सिंह - फोटो : अमर उजाला

मेहनत और जज्बे से बनीं डॉक्टर, प्राचार्य पद तक संभाला

डॉ. सरोज सिंह आगरा की वरिष्ठ और नामी स्त्री रोग विशेषज्ञ है। कक्षा छह में स्वास्थ्य परीक्षण के लिए आए डॉक्टर को देख मन में ठान लिया कि बड़ी होकर डॉक्टर ही बनना है। पिता टेकचंद सड़ाना से अपने सपने को साझा किया तो वह बोले, बेटा बातों से नहीं मेहनत और जमकर पढ़ाई करनी होगी। फिर क्या सपने को पूरा करने के लिए पढ़ाई में जुट गईं। 

इंटरमीडिएट के बाद सन 1974 में एमबीबीएस के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। 1983 में एमएस की और फिर शुरू हुआ मरीजों की सेवा का प्रकल्प। विभागाध्यक्ष बनी और फिर एसएन का प्राचार्य पद भी संभाला। डॉ. सरोज ने बताया कि उनका परिवार मध्यम वर्ग का था। चार भाई-बहन का परिवार था। पिताजी को परेशानियां भी आईं, लेकिन उन्होंने पढ़ाई में कैसी भी बाधा पैदा होने नहीं दी। 

8 of 9
जूनियर रेजीडेंट डॉ. गरिमा कन्नौजिया - फोटो : अमर उजाला

कोरोना से लड़ी जंग, हौसले से मिली जीत

एसएन मेडिकल कॉलेज की मेडिसिन विभाग की जूनियर रेजीडेंट डॉ. गरिमा कन्नौजिया बोली कि वह उन्होंने कोरोना वायरस की तीनों लहर में कोविड अस्पताल में सेवाएं दीं। पहली लहर में तो घर भी नहीं जा सकते थे। 12 से 14 घंटे सेवा करने के बाद वीडियो कॉल के जरिये ही परिजनों से बात करते थे। 

दूसरी लहर में हालात बहुत बिगड़ गए। कई घंटे मरीजों के इलाज में जुटे रहते थे। पीपीई किट पहने होते थे, जिससे गर्मी से बुरा हाल था। लेकिन अपनी जिम्मेदारी का एहसास था। इसी हौसले से कोरोना से जंग लड़ी। महिला दिवस पर उन्होंने यही कहा कि महिलाएं पहले अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें, खुद फिट रहेंगी तो ही परिवार को फिट रख सकती हैं। 
विज्ञापन

9 of 9
मुक्ता साराभाई - फोटो : अमर उजाला

पति को खोने के बाद खुद को संभाला और दूसरों की मदद की

कोरोना संक्रमण के दौरान अपने अधिवक्ता पति को खोने वाली सीए मुक्ता साराभाई ने अपना हौसला नहीं छोड़ा। पति की बीमारी के दौरान आर्थिक रूप से कमजोर होने के बाद अपनी प्रैक्टिस को दोबारा शुरू करने के साथ ही स्वयंसेवी संगठनों के साथ मिलकर महिलाओं की मदद भी की। विजय नगर की रहने वाली मुक्ता साराभाई बताती हैं कि दिसंबर 2020 में संक्रमण के चलते पति विवेक साराभाई ने साथ छोड़ दिया। 

दो माह तक अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद भी उन्हें नहीं बचा पाईं। ऐसे में 10 साल के बेटे शिवेन को संभालने के साथ ही आर्थिक संकट गहरा गया। उन्होंने दोबारा से अपनी प्रैक्टिस शुरू की। इसके साथ ही अप्रैल में आई संक्रमण की लहर में कमजोर तबके की महिलाओं को मदद की। मुक्ता बताती हैं कि जिन महिलाओं के पति नहीं रहे, उनको परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए काउंसिलिंग करती हैं। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें