विजयदशमी के पर्व को लेकर भगवान श्रीकृष्ण की जन्म और लीला भूमि पर पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जयजयकार हो रही है। जगह-जगह रामलीला का मंचन किया जा रहा है। श्रीराम की भक्ति के साथ इस धार्मिक भूमि पर रावण के पूजन की भी तैयारी हो रही है। दशहरा पर रावण के पूजन की यह परंपरा वर्षों पुरानी है।
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फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
रावण को भले ही बुराई के प्रतीक के रूप में माना जाता है, लेकिन मथुरा में रावण को पूजने वाले भी हैं। दशहरा पर एक तरफ रावण यहां जल रहा होता है तो दूसरी ओर उनके भक्त शिव मंदिर में रावण की पूजा अर्चना कर रहे होते हैं। यमुना के किनारे सदर में बने शिव मंदिर में रावण के पूजन की परंपरा वर्षों से निभाई जा रही है। यह परंपरा इस बार भी निभाई जाएगी।
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ओमवीर सारस्वत एडवोकेट
- फोटो : अमर उजाला
रावण की पूजा करने वाले ओमवीर सारस्वत एडवोकेट ने बताया कि भगवान शिव की पूजा करने वाले महाराज दशानन के स्वरूप को हम नमन करते हैं। प्रचंड विद्वान होने के नाते इस तरह से रावण का पुतला दहन नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रावण परम विद्वान थे, रावण के पास बहुत ही अद्भुत शक्तियां थीं। राम और लक्ष्मण ने भी अंत समय उनसे शिक्षा ली।
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रावण की पूजा करते सारस्वत समाज के लोग
- फोटो : अमर उजाला
ओमवीर ने बताया कि दूसरे किसी भी व्यक्ति का अंतिम संस्कार एक बार होता है, रावण का दहन हर वर्ष करना अनुचित है। हम इसका विरोध करते रहेंगे। इस पूजा परंपरा से जुड़े संजय सारस्वत, कुलदीप अवस्थी, राकेश सारस्वत ने बताया कि रावण के पुतला दहन की प्रक्रिया बंद होनी चाहिए। वो रावण में अपार गुणों को देखते हुए उनका पूजन करते रहेंगे।
करीब 10 साल पहले रावण का पुतला जलाए जाने का विरोध करते हुए स्थानीय न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसे कोर्ट ने सुनने से इंकार कर दिया है। इसके बाद एनजीटी में गुहार लगाई गई है। इसमें प्रत्येक वर्ष रावण के दहन के विरोध किया है। इससे होने वाले प्रदूषण से जनजीवन को हो रहे नुकसान का हवाला दिया गया है।