ब्रज की पावन भूमि पर कभी यमुना किनारे लता-पताओं के बीच राधाकृष्ण ने लीलाएं की थीं। इस भूमि को यहां आए आचार्यों ने यह सोचकर अपनी आराधना स्थली बनाया कि ये वन-उपवन और लता-पताएं ही ठाकुर जी की लीलाओं के साक्षी हैं। जो उन्हें राधाकृष्ण के दर्शन कराएंगे, लेकिन अब इन्हीं लता-पताओं के अस्तित्व पर संकट छाया है। हम बात कर रहे हैं वृंदावन की, जहां अब न वृंदा (तुलसी) रही और न ही वन।
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वृंदावन
- फोटो : अमर उजाला
वृंदावन अर्थात वृंदा (तुलसी) का वन, लेकिन यहां तो अब कहीं वृंदा नजर ही नहीं आती है। हर तरफ कंकरीट का जंगल है। ऊंचे-ऊंचे भवन तेजी के साथ फलफूल रहे हैं। इन भवनों की रफ्तार इस कदर बढ़ रही है कि प्रिया-प्रीतम की निकुंज नित्य बिहार लीलाओं और स्वामी हरिदास जी महाराज और उनके परंपरागत आचार्यों व संतों की भक्ति साधना स्थलियों को ही चारों तरफ से ढक लिया है। इस आध्यात्मिक भूमि में अब वन-उपवन तो नजर ही नहीं आते हैं।
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बांकेबिहारी की प्राकट्य स्थली निधिवन
वृंदावन के मूल स्वरूप को आज भी सजाए हुए टटिया स्थान, दल्लान बाग, ललिता बाग, राधा बाबरी, निधिवन, राधा टीला के आसपास बढ़ते कंकरीट के जंगल को देख चिंतित संतों ने इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए विकास प्राधिकरण का द्वार खटखटाया है। इस आशय का पत्र विकास प्राधिकरण उपाध्यक्ष नगेंद्र प्रताप को सौंपा है, जिसमें कहा है कि प्राचीन स्थलों के आसपास भवन निर्माण नहीं रोका गया तो ये प्राचीन संपदा खत्म हो जाएंगी।
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टटिया स्थान वृंदावन
टटिया स्थान
वृंदावन में यह धार्मिक, ऐतिहासिक और रमणीक स्थल है। यह संगीत सम्राट स्वामी हरिदास जी की साधना स्थली है। जहां यमुना की रेत और वृक्षों की ही मौजूदगी है, जो वृंदावन के मूल स्वरूप को सजोए हुए हैं।
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निधिवन में श्रद्धालु
- फोटो : अमर उजाला
निधिवन
यह ठाकुर श्रीबांकेबिहारी महाराज की प्राकट्य स्थली है। यहां स्वामी हरिदास जी ने अपनी साधना से ठाकुर श्रीबांकेबिहारी को प्रकट किया था, जो आज भी कृष्णकालीन लता-पताओं से भरा हुआ है।
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सेवाकुंज वृंदावन
- फोटो : social media
सेवाकुंज
से राधाकृष्ण की रास स्थली कहा जाता है। यहां मौजूद वृक्षावली भी प्राचीन वृंदावन के दर्शन कराती है। यहां राधारानी की चित्रपट पूजा होती है।
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किशोर वन
किशोर वन
यह हरिराम व्यास की तप स्थली है। निधिवन की तरह यहां भी लता पता और प्राचीन वृक्षावली मौजूद हैं।
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रंगजी का बगीचा
- फोटो : अमर उजाला
रंगजी का बगीचा
इस बगीचे में भगवान गोदारंगमन्नार ब्रह्मोत्सव के दौरान प्रतिदिन मंदिर से यहां आते हैं। ठाकुर जी शृंगार में भी इन्हीं बगीचे के फूल उपयोग में लाए जाते हैं।
अब राधाटीला पर आने से बचते हैं पक्षी
करीब एक दशक पहले तक राधाटीला पर पौधों की बहुतायत को देखते हुए बड़ी संख्या में पक्षियों की मौजूदगी मिलती थी। इन्हें देखने के लिए भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचते थे, लेकिन आसपास ऊंचे भवनों से यह पक्षी भी यहां आने से अब डरने लगे हैं। बाहर से आने वाले पक्षियों ने तो यहां आना ही बंद कर दिया है।