भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्व.अटल बिहारी वाजपेयी की आज द्वितीय पुण्यतिथि है। अटल बिहारी वाजयेपी का ब्रज से गहरा नाता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी बटेश्वर के आंगन में खेलकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचे, लेकिन सादगी, सरलता, शुचिता अटल रही।
1988 में कोठी मीना बाजार में भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। उस समय लालकृष्ण आडवाणी अध्यक्ष थे। अटल जी इसमें तीन दिन रहे। उनके स्वागत केलिए शहर ने अनूठी तैयारी की। जो बाजार जिस सामान के लिए मशहूर है, उसी का गेट बनाया। जैसे कपड़ा मार्केट ने कपड़े, बर्तन मार्केट ने बर्तनों का, फूल मार्केट ने फूलों का गेट बनाया।
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (फाइल फोटो)
अटल जी को ताजनगरी के लोग बेइंतहा प्यार करते थे। यह मौका था प्यार को जाहिर करने का। अधिवेशन के दूसरे दिन अटलजी का रोड शो हुआ। इसमें अटल जी पर फूलों की बारिश की गई। उनकी गाड़ी फूलों से लद गई। भाजपा नेता पुरुषोत्तम खंडेलवाल बताते हैं कि पुष्पवर्षा से अटलजी अभिभूत हो गए। तीसरे दिन अधिवेशन में बोले, लोग ईंट-पत्थरों से घायल करते हैं, आगरावालों ने प्यार के फूलों से घायल कर दिया। उन्होंने यह किस्सा कई सभा में सुनाया।
मेयर नवीन जैन बताते हैं सन 1988 में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन आगरा में हुआ था। देश और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। चूंकि कांग्रेस की सरकार थी तो सरकारी मशीनरी से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा था। जलकल विभाग (जल संस्थान) को कोठी मीना बाजार में पानी की व्यवस्था करनी थी लेकिन अधिकारी इस काम में रुचि नहीं ले रहे थे। कभी एक टैंकर आ जाता तो तभी दो टैंकर। इसकी वजह से न तो पीने और खाने बनाने को पर्याप्त पानी मिल रहा था और न नहाने के लिए। इसकी नतीजा यह हुआ कि अटल जी बिना नहाए रह गए। दिन भर कार्यक्रम चला था। स्नान न हो पाने के कारण अटल जी परेशान थे।
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आगरा शिखर वार्ता के दौरान की फोटो
अटलजी को आगरा के रामबाबू के परांठे बहुत पसंद थे। जब भी आगरा आते, परांठे जरूर खाते। किस्सा 2001 का है। शिखर वार्ता चल रही थी । पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ आए हुए थे। पंचतारा होटलों में नाना प्रकार के व्यंजन बने थे, लेकिन अटल जी के मुंह में पानी आया परांठों को याद करके। आगरा के मेयर नवीन जैन बताते हैं कि प्रधानमंत्री के स्टाफ ने उन्हें इसकी जानकारी दी। वह रामबाबू के रेस्तरां से आलू, प्याज, गोभी सहित कई तरह के परांठे लेकर पहुंचे। अटलजी ने आलू के परांठे बड़े चाव से खाए।
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अटल बिहारी वाजपेयी
- फोटो : अमर उजाला
अटलजी का पैतृक गांव तीर्थराज बटेश्वर है। इसके आंगन में अटलजी का बचपन बीता। बटेश्वर मेले के समापन पर कवि सम्मेलन होता था। इसमें अटलजी जरूर आते थे। किस्सा 1978 का है। होली का दिन था। अटलजी जी भरकर होली खेले। लोगों ने उन्हें रंग डाला। इसके बाद जमुना में स्नान किया। बोले, होली तो ऐसी ही होती है, मजा आ गया।
अटलजी लजीज व्यंजनों के शौकीन थे। वाराणसी जाते तो गिलौरी जरूर खाते। लखनऊ पहुंचते ही लस्सी पीते। इसी तरह आगरा या मथुरा आते तो बेड़ई-कचौड़ी का स्वाद लिए बगैर नहीं रह पाते। एक बार फरह के दीन दयाल धाम में सुबह आठ बजे पहुंचना था। आगरा में सर्किट हाउस में रुके थे। सुबह उठते ही बोले कि आज कचौड़ी नहीं खाउंगा। पुरुषोत्तम खंडेलवाल बताते हैं कि वो नाश्ते में बेड़ई और कचौड़ी लेकर ही पहुंचे थे। उन्हें जैसे ही बताया कि देवीराम की हैं, बस फिर क्या था, उनके मुंह में पानी आ गया। बेड़ई, कचौड़ी और जलेबी का नाश्ता किया और फिर फरह रवाना हुए।