मयन ऋषि की तपोभूमि अनगिनत ऐतिहासिक घटनाओं की साक्षी रही है, लेकिन यहां एक गांव ऐसा भी है इतिहास खुद में कई कहानियों को समेटे हुए है। जिले के लोग इस इतिहास को कम ही जानते हैं, लेकिन इसकी कहानी और इतिहास ने विदेशी शोधार्थियों को न केवल अपनी ओर आकर्षित किया बल्कि उनके माध्यम से विदेशों तक भी ये कहानी जा पहुंची। ये छोटा सा गांव है करीमंगज। करीमगंज के इतिहास से लेकर वर्तमान तक के सफर से रूबरू कराती नीलेश शर्मा की रिपोर्ट...
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करीमगंज
- फोटो : अमर उजाला
मैनपुरी से कुरावली रोड पर दस किलोमीटर की दूरी पर बसे करीमगंज को तब रूपायन के नाम से जाना जाता था। 12वीं सदी में अस्तित्व में आए रूपायन को व्यापार का केंद्र माना जाता था। अनाज और सब्जियों का व्यापार यहां से होता था। रूपायन इलाहाबाद से मथुरा के लिए जाने वाले कच्चे मार्ग पर स्थित होने के चलते और भी प्रसिद्ध था। जिस समय की ये बात है तब मैनपुरी की नींव भी नहीं पड़ी थी। रूपायन में तब एक किला भी हुआ करता था, जिसे लेकर कई बार यहां आक्रमण भी हुआ। सन् 1280 में यहां बने किले को एटा के नवाब करीम खान ने अपने दो कर्मचारी अमोल और घनश्याम की इच्छा पर ध्वस्त कर दिया था। दरअसल अमोल और घनश्याम रूपायन के ही रहने वाले थे, जिन्होंने एक आक्रमण में अपना सबकुछ खो दिया था। इसके बाद करीम खान ने ये किला ध्वस्त कर अमोल और घनश्याम को यहां बसा दिया। आज भी किले के अवशेष इस पूरी कहानी के मूक गवाह हैं। किले के ऊपर ही करीम खान की मजार भी बनी हुई है, जहां हिंदू और मुस्लिम पूजा अर्चना के लिए आते हैं। उन्हीं के नाम पर गांव का नाम रूपायन से बदलकर करीमगंज कर दिया गया।
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मैनपुरी का करीमगंज, जिसकी कहानी सात समंदर पार तक पहुंची
- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका तक ऐसे पहुंची कहानी
करीमगंज के इतिहास पर अब तक कुल चार किताबें लिखी जा चुकी हैं। ये चारों किताबें अमेरिका से आए शोधार्थियों और प्रोफेसर्स ने लिखी हैं। गांव निवासी उमेश चंद्र पांडेय बताते हैं कि सबसे पहले वर्ष 1925 में करीमगंज आए समाजशास्त्री विलियम वाइजर और उनकी पत्नी शार्लोट वाइजर आए। उन्होंने गांव में पांच साल रहकर हिंदू जिजमानी सिस्टम और इंडिया नामक किताब लिखी। लगभग पांच साल बाद पति की मृत्यु के बाद शार्लोट वाइजर ने फोर फैमिलीज ऑफ करीमगंज लिखी। इस किताब की कहानी करीमगंज के रहने वाले चार अलग-अलग जातियों के परिवारों के तुलनात्मक जीवन पर आधारित थी। इन किताबों को पढ़ने के बाद न्यूयॉर्क स्थित साइरेकस यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलोजी की प्रोफेसर सुसेन एस वाडले 1965 के करीब करीमगंज आईं। यहां अध्ययन के बाद उन्होंने बिहाइंड द मड वॉल्स और स्ट्रगलिंग विद डेस्टिनी इन करीमपुर पुस्तकें लिखीं। सुसेन एस वाडले आज भी करीमगंज आती हैं।
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करीमगंज का टीला
- फोटो : अमर उजाला
शोधार्थियों ने इसलिए चुना करीमगंज
एक सवाल ये भी है कि आखिर इतने बड़े मैनपुरी में अमेरिकी शोधार्थियों ने केवल करीमगंज को ही क्यों चुना। इसके बारे में गांव निवासी 70 वर्षीय उमेश पांडेय बताते हैं कि तत्कालीन कलेक्टर से शोधार्थियों ने भारतीय वर्ण व्यवस्था और जिजमानी प्रथा पर अध्ययन के लिए राय मांगी थी। इस पर उन्होंने औंछा, ललूपुर और करीमगंज का सुझाव दिया। करीमगंज में 17 जातियों के लोग रहते थे, इसलिए शोधार्थियों ने इसे ही बेहतर समझा। उमेश पांडेय को इस पूरे मामले की जानकारी इस लिए है क्यों कि शोधार्थी लंबे समय तक उनके ही घर में रहे। सुसेन एस वाडले के साथ तो खुद उन्होंने भी शोध कार्य में मदद की।