दरअसल अगर मनुष्य अपने हर कर्म को और उसके फल को विष्णु को समर्पित करें तो विष्णु को ये सब करने की कोई जरुरत नहीं पड़ती और ऐसा व्यक्ति हमेशा स्थिर लक्ष्मी का सुख भोगता है। लेकिन मनुष्य तो सुख आने पर कुछ भी बकने लगता है। बंधु, बांधव, स्त्रियाँ उसे प्रिय लगने लगते हैं। एक समय ऐसा भी आता है जब वो उन भोग के साधनों को ही सत्य मान लेता है।
ऐसी अवस्था में अपने भक्त का कल्याण करने के लिए श्री विष्णु उसका सब कुछ छीनते हैं। सब कुछ छीन जाने पर वो समझता है कि जिन मित्रों को, स्त्रियों को, जिन भोग के साधनों को मैं सत्य मान बैठा था वो तो धन और पद के खत्म होते ही चले गए। स्त्री प्रेम से नहीं मेरे धन के कारण थी, मित्र मेरे स्नेह के कारण नहीं बल्कि लोभ के कारण थे और ऐसा भान होने पर वो पुन: शुद्ध होकर ईश्वर में तल्लीन होता है।
भागवत के एक प्रसंग में गजराज मोक्ष की कथा है। उस गजराज ने तब तक विष्णुजी को नहीं पुकारा जब तक की उसके सारे विकल्प खत्म नहीं हुए। उसके परिवारजन, मित्र, सगे संबंधी, स्त्रियां कोई उसकी मदद करने नहीं आया तब जाकर उसने पूर्ण आत्मा से विष्णुजी को पुकारा और बादलों को चीरते हुए श्री विष्णु प्रकट हुए।
दरअसल अनुकूल और प्रतिकूल ये सिर्फ बुद्धि की उपज है, विष्णु कृपा तो हर दिन हर पल हम पर है। वो हमें मोह, अहंकार, तृष्णा, भोग के कारण दिखाई नहीं देती है। जिस दिन गीता के कर्मयोग की बात मानकर आप अपने हर कर्म को विष्णु को सौंप देंगे तो जीवन में सदैव स्थिर लक्ष्मी आपको प्राप्त होगी।