मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के दौरान मची भगदड़ में बड़ी
संख्या में लोगों की मौत हो गयी है। मीना में इससे पहले भी कई बार पत्थर
मारने की परंपरा को निभाते समय इस प्रकार की घटना हुई है।
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मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के पीछे यह है कारण
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इस्लामिक विषयों के जानकार रामीश सिद्दीकी ने बताया कि यह परंपरा हजारों साल पहले शुरु हुई थी। जिस प्रकार बकरीद में प्रतीकात्मक रुप में बकरे की कुर्बानी दी जाती है उसी तरह मीना में शैतान को पत्थर मारने की प्रतीकात्मक परंपरा है।
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मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के पीछे यह है कारण
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इस परंपरा के पीछे हजरात इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल की कहानी है। हजरत इब्राहिम से जब अल्लाह ने उनके बेटे की कुर्बानी मांगी तो उन्होंने अपने बेटे को कुर्बान करने के फैसला किया।
मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के पीछे यह है कारण
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लेकिन शैतान उन्हें खुदा की राह से भटकाना चाहता था और कह रहा था कि यह कैसा खुदा है जो तुमसे तुम्हारा बेटा मांग रहा है। ऐसे समय में हजरत इब्राहिम ने एक पत्थर उठाकर शैतान को मारकर भगा दिया।
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मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के पीछे यह है कारण
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जहां पर हजरत साहब ने शैतान को पत्थर मारा था वहां एक स्तंभ है जिसे शैतान मानकर आज भी उसी परंपरा को निभाने के लिए तीर्थयात्री पत्थर मारते हैं।
मीना में शैतान को पत्थर मारने की परंपरा के पीछे यह है कारण
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रामीश सिद्दीकी के मुताबिक बहुत से लोग यह मानते हैं कि पत्थर उस स्तंभ में लगे, तभी शैतान भागता है। जबकि कुरान और हदीस में बताया गया है कि पत्थर उठाकर फेंकने भर से शैतान भाग जाता है। सिद्दीकी कहते हैं असल में यह अपने अंदर बैठी बुराइयों को दूर करने की बात है। लेकिन लोग इस बात को गहराई में उतारने की बजाय प्रतीक में ऐसे डूब चुके हैं कि इस प्रकार की घटनाएं सामने आ जाती है। इनका कहना है कि अगर लोग कुरान और हदीस को अच्छी तरह से समझकर हज यात्रा करें तो इस तरह की दुर्घटनाएं रुक सकती हैं और लोगों के जीवन में बड़ा बदलाव आ सकता है।