फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जानिए आखिर क्यों हिंदू धर्म में मांस खाना मना है

Fri, 09 Aug 2019 12:09 PM IST
प्रशांत राय धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 6
- फोटो : social media
हर धर्म में अहिंसा को सबसे परम धर्म माना गया है। लेकिन वह हिंसा जो अत्याचारी से अपनी रक्षा के लिए ना की गई हो, उसे सबसे बड़ा अधर्म माना जाता है और मांस का भोजन इसी प्रकार की हिंसा से प्राप्त होता है। इस तरह हिंदुओं के लिए मांस खाना सबसे बड़ा पाप माना जाता है। मांसभक्षण को लेकर महाभारत में घोर निंदा की गई है। महाभारत में कई ऐसे श्लोक हैं जो मांस ना खाने के आदेश देते हैं। आइए जानते हैं उन श्लोकों और उनके अर्थों के बारे में।
विज्ञापन

2 of 6
स्वमांसं परमांसेन यो वर्धयितुमिच्छति।
नाति क्षुद्रतरस्तस्मात्स नृशंसतरो नर।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति दूसरों के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है, उससे बढ़कर नीच और निर्दयी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है। 
विज्ञापन

3 of 6
- फोटो : पेक्सेल्स
अधृष्यः सर्वभूतानां विश्वास्यः सर्वजन्तुषु।
साधूनां सम्मतो नित्यं भवेन्मांसं विवर्जयन्।।

जो व्यक्ति मांस का त्याग कर देता है, वह सब प्राणियों में आदरणीय, सब जीवों का विश्वसनीय और सदा साधुओं से सम्मानित होता है। 
 

4 of 6
ददाति यजते चापि तपस्वी च भवत्यपि।
मधुमांसनिवृत्येति प्राह चैवं बृहस्पति।।

बृहस्पति जी का कहना है कि जो व्यक्ति मद्य और मांस का त्याग कर देता है वह दान देता, यज्ञ करता है और तप करता है। इसका मतलब यह है कि उस व्यक्ति को इन तीनों चीजों का लाभ मिलता है। 
विज्ञापन

5 of 6
- फोटो : file photo
एवं वै परमं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिणः।
प्राणा यथाऽऽत्मनोऽभीष्टा भूतानामपि वै तथा।।

इस श्लोक का यह अर्थ है कि मनीषी पुरुष अहिंसारूप परमधर्म की तारीफ करते हैं। जैसे व्यक्ति को अपना प्राण प्रिय होता है वैसे ही सभी प्राणियों को अपने-अपने प्राण प्रिय होते हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
- फोटो : file photo
न हि मांसं तृणात् काष्ठादुपलाद् वापि जायते।
हत्वा जन्तुं ततो मांसं तस्माद् दोषस्तु भक्षणे।।

मांस ना तो घास से, ना लकड़ी से या फिर ना तो पत्थर से पैदा होता है। मांस प्राणी की हत्या करने पर ही मिलता है। इसलिए मांस खाने में दोष है। 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें