हमारी सनातन संस्कृति में अभिवादन करने के तरीके विनम्रता और समर्पण भाव को दर्शाते हैं। चाहे फिर वह सिर झुका कर हाथ जोड़कर नमस्कार करना हो या फिर चरण स्पर्श करना।शास्त्रों के अनुसार देवता,गुरु,माता-पिता एवं बुजुर्गों की चरण वंदना को श्रेष्ठ माना गया है।शास्त्रों के अनुसार भगवान श्रीराम नित्यप्रति सुबह उठकर सबसे पहले माता-पिता के चरणों में सिर झुकाकर आशीर्वाद प्राप्त करते थे।भगवान गणेश भी देवताओं में प्रथम पूज्य अपने माता-पिता के आशीर्वाद से ही बने।
जब कोई हमसे कम उम्र का हमारे पैर छूता है तो उस समय ईश्वर का नाम लेकर हमारे मुख से आशीर्वाद,दुआएं,सदवचन ही निकलते हैं जिससे पैर छूने वाले व्यक्ति को भी सकारात्मक फल मिलता है। आशीर्वाद देने से चरण स्पर्श करने वाले व्यक्ति की समस्याएं ख़त्म होती हैं। यश , कीर्ति व उम्र बढ़ती है और नकारात्मक शक्तिओं से उसकी रक्षा होती है। हमारे द्वारा किए गए शुभ कर्मों का सकारात्मक प्रभाव चरण स्पर्श करने वाले पर होता है। अनेक शोधों से अब यह स्पष्ट हो चुका है कि चरण स्पर्श करने से शारीरिक,मानसिक एवं वैचारिक विकास भी अच्छा होता है।यह एक ऐसी सुदृढ़ परम्परा है जिससे न केवल बड़ों का आशीर्वाद ही मिलता है अपितु बड़ों के स्वभाव की अच्छी बातें भी हमारे अंदर आती हैं।