आचार्य चाणक्य
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कुचैलिनं दन्तमलोपधारिणं बह्वाशिनं निष्ठुरभाषिणं च।
सूर्योदये चास्तमिते शयानं विमुञ्चतिश्रीर्यदि चक्रपाणि:।।
इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने दांतो की साफ-सफाई नहीं करता है उसके पास कभी लक्ष्मी नहीं रुकती हैं। ऐसे लोगों से लक्ष्मी जी रुष्ट हो जाती हैं जिसके कारण व्यक्ति दरिद्र हो जाता है। इसी तरह से जो लोग अपने आस-पास स्वच्छता नहीं रखते हैं, और गंदे वस्त्र पहनते हैं ऐसे लोगों के पास कभी लक्ष्मी नहीं ठहरती हैं। ऐसे लोगों को समाज में मान-सम्मान भी नहीं मिलता है।