आचार्य चाणक्य
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एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः। चतुर्भिगमन क्षेत्रं पञ्चभिर्बहुभि रणम्॥
भावार्थ: तप अकेले में करना उचित होता है, पढ़ने में दो, गाने मे तीन, जाते समय चार, खेत में पांच व्यक्ति तथा युद्ध में अनेक व्यक्ति होना चाहिए।