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मृत्यु की शैय्या पर लेटे भीष्म ने युधिष्ठिर को दिए थे ये उपदेश, जीवन जीने की मिलती है सीख

Fri, 03 Jul 2020 07:25 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भीष्म पितामह के उपदेश - फोटो : social media

महाभारत में भीष्म पितामाह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। इस कारण तीरों की शैय्या पर होने के बावजूद भीष्म कई दिनों तक जीवित रहे। उन्होंने दुर्योधन को समझाने की कोशिश की लेकिन दुर्योधन ने उनकी बात नहीं मानी। पितामह के मृत्यु की शैय्या पर लेटे होने बाद भी आठ दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा।

युद्ध के बाद युधिष्ठिर की ग्लानि और पश्चाताप को दूर करने के लिए भीष्म ने राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म के बहुमूल्य उपदेश दिए। ये उपदेश हमारे जीवन में भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। उनके उपदेशों में से कुछ अंश आप आगे पढ़ सकते हैं।

 

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अपने मन को सदैव वश में रखना चाहिए - फोटो : social media

अपने मन को सदैव वश में रखना चाहिए। कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए। अगर कोई आपको कटु वचन कहता है तो भी उसे कुछ नहीं कहना चाहिए। अतिथि और लाचार को सदैव आश्रय दें। दूसरों की न निंदा करें और न सुनें।

मार खाने पर भी अपने आप को शांत रखें। शास्त्रों को सदैव नियम पूर्वक सुने और पढ़े। दिन के समय न सोना। क्रोध न करना। स्वंय आदर की इच्छा न करके भी दूसरों का सम्मान करना। भोजन स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वास्थ के लिए करना। आगे पढ़े....

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सत्य ही सनातन धर्म है

सत्य ही सनातन धर्म है। यह सभी धर्मों से उत्तम है। सत्य से ही तप और योग उत्पन्न होते हैं। सत्य ही ब्रह्मा है। सब कुछ सत्य के अंतर्गत आता है। सत्य से ही मनुष्य स्वर्ग जाता है। झूठ हमें अंधकार की तरफ ले जाता है। यहां पर प्रकाश का अर्थ स्वर्ग तो नरक को अंधकार कहा गया है।

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वेद भी सत्य का ही उपदेश देते हैं - फोटो : social media

सभी प्रणियों को एक समान समझना, ईर्ष्या द्बेश से दूर रहना, शील और लज्जा के गुणों को अपनाना, दुष्कर्मों से दूर रहना, किसी को कष्ट न पहुंचाना, इनद्रियों को वश में रखना, मन की पवित्रता को बनाए रखना, सत्य बोलना, क्षमा करना, साहस और विद्या आदि ये तेरह सत्य धर्म के लक्षण हैं। वेद भी सत्य का ही उपदेश देते हैं। सत्य बोलना सहस्त्रों अश्वमेध यज्ञों के फल के बराबर होता है।

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कभी भी कटु वचन न बोलें सदैव ऐसे वचन बोलो जो दूसरे को अच्छे लगें - फोटो : अमर उजाला

कभी भी कटु वचन न बोलें सदैव ऐसे वचन बोलो जो दूसरे को अच्छे लगें। बुरा बोलना,निंदा करना, भला बुरा कहना यह सब त्याग देना चाहिए। दूसरों के सम्मान न करना, अहंकार दिखाना ये सभी अवगुण होते हैं।

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अपने आप को वश में करने के लिए व्यक्ति को पहले लोभ और मोह से दूर होना चाहिए

जो सुख इस लोक में कामनाओं की पूर्ति होने पर मिलता है और परलोक में जो सुख प्राप्त होता है वह उस सुख के 16वें हिस्से के बराबर भी नहीं है। जो सुख हमें कामनाओं से मुक्त होने पर प्राप्त होता है। अपने आप को वश में करने के लिए व्यक्ति को पहले लोभ और मोह से दूर होना चाहिए।

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मोह का फल मृत्यु और सत्य का फल अमृतत्व प्राप्त होता है

मोह का फल मृत्यु और सत्य का फल अमृतत्व प्राप्त होता है। इसलिए मृत्यु और अमृतत्व दोनों ही मनुष्य के अधीन हैं। पूरे संसार को वृद्धावस्था ने घर रखा है। दिन प्रति दिन उस पर मृत्यु का प्रहार होता जा रहा है। दिन आता है, रात बीत जाती है, जागों तुरंत उठो, समय को व्यर्थ न गवांओ, अपने कल्याण के लिए कुछ कार्य करों। क्योंकि तुम्हारे कार्य पूर्ण नहीं हो पाते है तब तक मृत्यु तुम्हें अपने साथ ले जाती है।

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निर्धनता को स्वंय ही स्वेच्छा पूर्वक अपनी इच्छा से स्वीकार करने से सुख मिलता है

निर्धनता को स्वंय ही स्वेच्छा पूर्वक अपनी इच्छा से स्वीकार करने से सुख मिलता है। यह सुख मनुष्य का कल्याण करता है,क्योंकि इस राह पर चलने से न तो कोई क्लेश रहता है न ही कोई आपका शत्रु बनता है। यह मार्ग भले ही कठिन लगता है लेकिन जिस मनुष्य को पवित्र जीवन जीना हो ऐसे भले मानुष के लिए यह मार्ग उप्युक्त और सुगम है।

क्योंकि ऐसे मनुष्यों के लिए संपत्ति का कोई मोह नहीं रहता। उनके लिए इससे बढ़ कर कोई दूसरी संपत्ति या सुख नहीं है। एक तुला के पल्ले में ऐसी निर्धनता को और दूसरे पल्ले में राज्य को रखने पर अकिंचनता का पल्ला भारी रहता है। धनवान पुरूष को तो सदैव ही मृत्यु का भय रहता है।

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त्याग के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता है

कामनाओं को पूरा करने से श्रेष्ठ है कि उन्हें त्याग दिया जाए। क्योंकि त्याग के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। त्याग से मनुष्य को परम सुख की अनुभूति होती है त्याग किए बिना परम आदर्श की सिद्धी नहीं हो सकती। मोह और कामनाओं को त्याग कर अपने चित्त को शांत करों।

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जो व्यर्थ में ही अपने आप को दुखी करता है वह अपना सब कुछ नष्ट कर लेता है

ऐसा मनुष्य सदैव सुखी रहता है। जो व्यर्थ की चिंता न करने वाला हो, जो सत्य का पालन करता है जिसे सांसारिक मोह न हो, दो तरह के मनुष्य को हर सुख प्राप्त होता है एक तो वे जो मूर्ख होते हैं, और दूसरे वे जिन्हें ज्ञान का परम प्रकाश प्राप्त हो गया हो। जो लोग इन दोनों को बीच में अटके रहते हैं वे दुखी हो जाते हैं। जो व्यर्थ में ही अपने आप को दुखी करता है वह अपना सब कुछ नष्ट कर लेता है।

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ऐसे मनुष्य जो अपना रास्ते स्वंय बनाते हैं वे सुख के भागी बनते हैं - फोटो : अमर उजाला
जो दूसरों के सुख और धन को देखकर जलन की भावना नहीं रखते हैं। विद्वानों का आदर करते हैं। धर्म के उपदेश को किसी भी स्थान से सुनते हैं। जो अपने रास्ते स्वंय बनाते हैं। आलस्य नहीं करते हैं अपना सारा काम समय पर करते हैं ऐसे मनुष्य सुख के भागी बनते हैं। 
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