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देवी-देवताओं की शक्ति समाई होती है मंत्रों में, नियमित जप से दूर हो जाते हैं सभी दुख और संकट

Wed, 26 Feb 2020 10:57 AM IST
योगेश जोशी धर्म डेस्क, अमर उजाला
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धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मंत्रो के नियमित जप से जीवन में एक नई ऊर्जा का प्रवाह होता है। मंत्रों का जप से बहुत अधिक लाभ मिलता है, हर पीड़ा और पाप को मंत्र का जाप हर सकता है। देवी-देवताओं की शक्ति मंत्रो में समाई होती है। आज हम आपको 3 मंत्रो और उनसे होने वाले लाभ के बारे बताते हैं।  अगली स्लाइड्स में पढ़ें, मंत्र और उनके लाभ।
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सभी तरह के संकटों से निपटने के लिए 
  • सभी तरह के संकटों से निपटने के लिए हनुमान जी का यह मंत्र बड़ा ही कारगार साबित होता है। हनुमान जी इस कलयुग में अजर अमर हैं और अपने भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। आप भी अगर जीवन में किसी भी तरह से परेशान हैं, आपके कोई भी काम नहीं बन रहे हैं या आत्मविश्वास की कमी है तो आप इस मंत्र का नियमित रूप से जाप करें।
मंत्र
  • ॐ हं हनुमंते नमः
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बेहतर स्वास्थ्य के लिए
  • धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अच्छे स्वास्थ्य के लिए शिव जी का यह मंत्र बड़ा ही उपयोगी साबित होता है । इस जप के करने से स्वास्थ्य बेहतर होता है और साथ ही मानसिक शांति की भी अनुभूति होती है। जिन व्यक्तियों को अधिक क्रोध आता है उन्हें भी इस मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र के अनेको फायदे हैं, नियमित रूप से इस मंत्र का जाप करना चाहिए।
मंत्र 
  • ॐ नमः शिवाय 
 

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धोखे से बचने के लिए और बेहतर जीवनशैली के लिए
  • व्यक्ति जीवन में कही बार धोखे का शिकार हो जाता है और निराशा में डूब जाता है। आप भी अगर धोखे से बचना चाहते हैं और एक बेहतर जीवनशैली जीना चाहते हैं तो नित्य नियम से गायत्री मंत्र का जप करें। गायत्री मंत्र के भी कहीं फायदे धार्मिक शास्त्रों में बताएं गए हैं।


गायत्री मंत्र  
  • ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
 
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सबसे प्रभावशाली मंत्र है- महामृत्युंजय मंत्र
इस मंत्र का जाप करने से वैभव व ऐश्वर्य की कामना पूरी होती है।  ऐसा चमत्कारी मंत्र है, जिसके नित्य जाप से कुंडली में मौजूद दोष दूर हो जाते हैं।
  •  महामृत्युंजय मंत्र-                                                                                                                                                                                                              'ऊं त्रयम्बकं यजामहे, सुगन्धिं पुष्टिवर्धनं उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मोक्षिय मामृतात्।'
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