चैत्र नवरात्रि 2021
- फोटो : अमर उजाला
ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने वाली देवी
अपनी मंद,हल्की हंसी द्वारा अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्माण्डा देवी के नाम से अभिहित किया गया है।जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था,चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार परिव्याप्त था,तब इन्हीं देवी ने अपने 'ईषत' हास्य से ब्रह्माण्ड की रचना की थी।अतः यही सृष्टि की आदि-स्वरूपा,आदि शक्ति हैं।इनके पूर्व ब्रह्माण्ड का अस्तित्व नहीं था।इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में स्थित है। सूर्य लोक में निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही है, इनके तेज़ की तुलना इन्हीं से की जा सकती है।अन्य कोई भी देवी-देवता इनके तेज़ और प्रभाव की समता नहीं कर सकते। इन्हीं के तेज़ और प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रहीं हैं।
ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं और प्राणियों में स्थित तेज़ इन्हीं की छाया है। इनकीआठ भुजाएं हैं,अतः ये अष्टभुजादेवी के नाम से भी जानी जाती हैं।इनके सात हाथों में क्रमशः कमण्डलु,धनुष,बाण,कमलपुष्प,अमृतपूर्ण कलश ,चक्र तथा गदा हैं।आठवें हाथ में सभी सिद्धियों और निधियों को देने वाली जपमाला है एवं इनका वाहन सिंह है।हमें चाहिए कि हम विधि-विधान के अनुसार माँ दुर्गा की उपासना और भक्ति के मार्ग पर अग्रसर हों।माँ के भक्ति मार्ग पर चलने पर साधक को उनकी कृपा का अनुभव होने लगता है।माँ की उपासना मनुष्य को सहज भाव से भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयस्कर मार्ग है।