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नो वूमेन्स लैंड: यहां सिर्फ मर्दों को मिलते हैं सारे अधिकार

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यह सुनकर आप हैरान रह जाएंगे कि हमारे देश में एक ऐसी जगह भी है जहां संपत्ति पर महिलाओं का कोई अधिकार नहीं होता। कारण जानकर हैरान रह जाएंगे।



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नो वूमेन्स लैंड: यहां सिर्फ मर्दों को मिलते हैं सारे अधिकार

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हिमाचल के जिला किन्‍नौर और लाहौल स्पीति जिला में आज भी महिलाओं को पुरुषों के बराबर दर्जा नहीं दिया जाता। संपत्ति पर यहां सिर्फ पुरूषों का अधिकार होता है। इसका दंश यहां महिलाएं दशकों से भोग रही हैं।
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नो वूमेन्स लैंड: यहां सिर्फ मर्दों को मिलते हैं सारे अधिकार

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हमीरपुर में आयोजित फिल्म फेस्टिवल में नो वूमेन्स लैंड नाम से बनी डाक्यूमेंट्री में किन्नौर और लाहोल स्पीति की महिलाओं का दर्द बयां करने की बेहतरीन कोशिश की गई है। इसे पेशे से पत्रकार देवकन्या ठाकुर चरितार्थ किया है।

नो वूमेन्स लैंड: यहां सिर्फ मर्दों को मिलते हैं सारे अधिकार

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इन जिलों में महिलाओं को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं मिलता। यहां अभी भी 79 वर्ष पुराना रीति रिवाज चला हुआ है। इस कानून को ‘वजीर उल अर्च’ कहा जाता है, यह वर्ष 1926 में अस्तित्व में आया था।
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नो वूमेन्स लैंड: यहां सिर्फ मर्दों को मिलते हैं सारे अधिकार

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इस कानून के तहत पैतृक संपत्ति पर सिर्फ पुरुष को हक दिया गया, जबकि महिलाओं को इससे वंचित रखकर घोर अन्याय किया गया है।
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इसके पीछे हैरान कर देने वाला मत दिया गया है। मानना है कि कि यदि घर पर ज्यादा महिलाएं रहेंगी तो वे परिवार में झगड़े का कारण बनेगी। ऐसे में परिवार में जब पति की मृत्यु हो जाती है तो उसकी संपत्ति का अधिकार उसके भाई को मिलता है।
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सबसे ज्यादा अन्याय उन महिलाओं से होता है जिनकी इकलौती औलाद बेटी है तो पिता की मौत के बाद उस बेटी या उसकी मां को कोई संपति नहीं मिलती। ये संपति उस शख्स के भाइयों में बंट जाती है। या फिर दूसरे पुरुष रिश्तेदार की हो जाती है।

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ऐसे में भले ही पिता की मौत के बाद बेटी या उसकी मां को भूखा मरना पड़े, मगर उसे संपति कुछ नहीं दिया जाता।

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ऐसे में महिलाओं को आज भी यहां अपनी संपत्ति के लिए लड़ाई लड़नी पड़ रही है। महिला दिवस के यहां की महिलाओं के लिए कोई खास मायने नहीं है। कई मामले कोर्ट में भी चल रहे हैं।

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संपति का अधिकार सीधा बेटों को दिया जाता है, जबकि बेटी को नहीं दिया जाता। इसे यहां के लोग ट्राइबल ट्रेडिशनल लॉ कहते हैं। यहां के लोग मानते हैं कि सरकार और बनाए गए कानून से उनका कोई लेना देना नहीं है।

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ससुराल से बेटे के नाम मकान होने पर बेटा अपने पिता से घर निर्माण के लिए लकड़ी ले सकता है। परंतु बहु के नाम पर मकान बनाने के लिए ससुर उसे लकड़ी नहीं देता।

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दिलचस्प यह है कि अगर कोई इस संबंध में प्रशासन के पास शिकायत करे तो उसे गांव से बाहर कर दिया जाता है।
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सही मायनों में यह नो वूमेन्स लैंड हैं और यहां महिलाएं सिर्फ पुरूषों की मेहरबानी की मोहताज होती है।

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