भगवान शिव का यह अकेला मंदिर है जहां पर त्रिलोकीनाथ के शीश पर महात्मा बुद्ध विराजमान है। यहां हिंदू त्रिलोकीनाथ को शिव तो बौद्ध अवलोकितेश्वर के नाम से पूजते हैं।
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शैव पीठ: जहां त्रिलोकीनाथ के शीश पर हैं बुद्ध विराजमान
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हिमाचल प्रदेश लाहौल स्पीति के से करीब सैंतीस किलोमीटर की दूरी पर त्रिलोकनाथ गांव है। हिंदुओं के लिए यह भक्ति केंद्र रहा है। जिसे शैव पीठ भी कहा जाता है। यहां मंदिर शिखर शैली का है, जहां पत्थर का ही प्रयोग हुआ है। साथ ही सीढ़ियां उतरकर बौद्ध मंदिर है।
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इसमें एक बड़ा धर्म चक्कर है। दूसरे गेट पर मुख्य मंदिर है। यहां छह भुजाओं वाली भगवान त्रिलोकी नाथ का मंदिर है।
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दूसरे गेट पर मुख्य मंदिर है। यहां छह भुजाओं वाली भगवान त्रिलोकी नाथ का मंदिर है। सिर पर बौद्ध की आकृति है। बौद्ध त्रिलोकीनाथ की प्रतिमा को अवलोकितेश्वर के रूप में तो हिंदू शिव के रूप में पूजते हैं।
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यानी हिंदुओं और बौद्धों के लिए यह स्थान साझा आध्यात्मिक स्थल है। मंदिर से जुड़ी अपनी गाथा है। भगवान शिव यहां तपस्या में मग्न रहे। मान्यता है कि वे यहां अज्ञात रूप से रहते हैं।
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पार्वती शिव से मिलने के लिए बेचैन थीं तो नारद और पार्वती ने उन्हें ढूंढा। लोककथा है कि शिव ने पार्वती को यहां अपने तीन विराट रूप दिखाए थे। तभी स्थान की मान्यता त्रिलोकीनाथ के तौर पर है। गांव त्रिलोकपुर के नाम से जाना जाता है।
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और भी किवदंतियां इस मंदिर के बारे में प्रचलित है। एक गड़रिए और त्रिलोकनाथ के पत्थर होने की कहानी भी इस स्थान से जुड़ी है। पहले इस गांव का नाम तुंदा बताया जाता है। इस गांव की कुछ दूरी पर हिन्सा गांव था। जहां टिंडणू गड़रिया रहता था।
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जो गांव वालों की भेड़-बकरियां चराता था। पर इन बकरियों का दूध कोई दुह लेता था। इसका न तो गांव वालों को और न ही गड़रिए को पता चलता था। गांव वालों ने मिथ्या आरोप टिंडणू पर जड़ दिए कि वह उनकी बकरियों का दूध चुरा लेता है। इस आरोप से टिंडणू तिलमिला गया।
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अपमान के घूंट पीकर रह गया था वह। पर उसने इस आरोप को झूठा साबित करने और चोर को ढूंढ निकालने का संकल्प लिया। उसने एक स्थान पर देखा कि एक पानी के स्रोत से सात मानव आकृतियां निकलीं और उन्होंने बकरियों को दुहना शुरू कर दिया।
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इन्हें पकड़ने की टिंडणू ने कोशिश की लेकिन सफेद कपड़ों में एक व्यक्ति को ही पकड़ पाया। इस व्यक्ति ने टिंडणू से उसे छोड़ने का आग्रह किया। पर टिंडणू पर तो चोर को पकड़ने से अधिक वह अपने मिथ्या आरोप को झुठलाना चाहता था। पर वह उसे गांव हिन्सा तक ले आया। वहां गांव वालों को उसने इस चोर के बारे में बताया।
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पर ग्रामीणों को लगा कि यह व्यक्ति मानव नहीं है। उन्हें लगा कि यह कोई देवता है। जिस कारण वहां के लोगों ने घी और दूध से उस व्यक्ति की पूजा की। उसने बताया कि वह त्रिलोकनाथ है और यहीं कहीं वह रहना चाहेंगे। उन्हें तुंदा गांव बहुत पसंद आया। बाद में उन्होंने टिंडणू को कहा कि वह उस जगह पर भी पूजा करके आएं जहां से वह उन्हें लेकर आया है।
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उसे यह भी कहा गया कि वह पीछे मुड़कर न देखने की त्रिलोकनाथ ने उसे सलाह दी। पूजा करने गए टिंडणू को वहां सात झरने दिखाई दिए। जिन्हें अब सप्तधारा के नाम से जाना जाता है। पर टिंडणू ने मुड़कर अपने गांव हिन्सा पहुंचने पर ही देखा। ऐसा करने से त्रिलोकनाथ और स्वयं टिंडणू भी पत्थर हो गए। जिस कारण तुंदा गांव का नाम त्रिलोकीनाथ पड़ा। यहां पर मंदिर बना।