मां-पुत्र के पावन मिलन का श्री रेणुका जी मेला हिमाचल प्रदेश के प्राचीन मेलों में से एक है। जो हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से पूर्णिमा तक उत्तरी भारत के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री रेणुका में मनाया जाता है। जनश्रुति के अनुसार इस दिन भगवान परशुराम जामूकोटी से वर्ष में एक बार अपनी मां रेणुका से मिलने आते हैं। यह मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य व पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा संगम है। रिपोर्ट: अशोक केडियाल, (सिरमौर, हिमाचल प्रदेश)
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भगवान परशुराम से आज इसलिए मिलने आती हैं मां रेणुका
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इस वर्ष यह मेला रेणुका जी तीर्थाटन पर 21 से 25 नवंबर तक परंपरागत ढंग से मनाया जा रहा है। यह स्थान नाहन से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है। रेणुका झील के किनारे मां श्री रेणुका जी व भगवान परशुराम जी के भव्य मंदिर स्थित हैं। कथानक अनुसार प्राचीन काल में आर्यवर्त में हैहय वंशी क्षत्रीय राज करते थे। भृगुवंशी ब्राह्मण उनके राज पुरोहित थे। इसी भृगुवंश के महर्षि ऋचिक के घर महर्षि जमदग्नि का जन्म हुआ। इनका विवाह इक्ष्वाकु कुल के ऋषि रेणु की कन्या रेणुका से हुआ।
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महर्षि जमदग्नि सपरिवार इसी क्षेत्र में तपस्या करने लगे। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की वह तपे का टीला कहलाता है। महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु गाय थी जिसे पाने के लिए सभी तत्कालीन राजा, ऋषि लालायित थे। राजा अर्जुन ने वरदान में भगवान दतात्रेय से एक हजार भुजाएं पाई थीं। जिसके कारण वह सहस्त्रार्जुन कहलाए जाने लगे। एक दिन वह महर्षि जमदग्नि के पास कामधेनु मांगने पहुंचे। महर्षि जमदग्नि ने सहस्त्रबाहु एवं उसके सैनिकों का खूब सत्कार किया।
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उसे समझाया कि कामधेनु गाय उसके पास कुबेर जी की अमानत है। जिसे किसी को नहीं दे सकते। गुस्साए सहस्त्रबाहु ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी। यह सुनकर मां रेणुका शोकवश राम सरोवर मे कूद गई। राम सरोवर ने मां रेणुका की देह को ढकने का प्रयास किया। जिससे इसका आकार स्त्री देह समान हो गया। जिसे आज पवित्र रेणुका झील के नाम से जाना जाता है। परशुराम अति क्रोध में सहस्त्रबाहु को ढूंढने निकल पड़े। उसे युद्ध के लिए ललकारा। भगवान परशुराम ने सेना सहित सहस्त्रबाहु का वध कर दिया।
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भगवान परशुराम ने अपनी योगशक्ति से पिता जमदग्नि तथा मां रेणुका को जीवित कर दिया। माता रेणुका ने वचन दिया कि वह प्रति वर्ष इस दिन कार्तिक मास की देवोत्थान एकादशी को अपने पुत्र भगवान परशुराम से मिलने आया करेंगी। मेला श्री रेणुका मां के वात्सल्य एवं पुत्र की श्रद्धा का एक अनूठा आयोजन है। पांच दिन तक चलने वाले इस मेले में आसपास के सभी ग्राम देवता अपनी-अपनी पालकी में सुसज्जित होकर मां-पुत्र के इस दिव्य मिलन में शामिल होते हैं।
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राज्य सरकार द्वारा इस मेले को अंतरराष्ट्रीय मेला घोषित किया गया है। श्री रेणुका विकास बोर्ड द्वारा मेले की पारंपरिक गरिमा बनाए रखने के अतिरिक्त इसे और आकर्षक बनाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। परंपरा के अनुसार 21 नवंबर को ददाहू से भगवान परशुराम की शोभायात्रा निकाली जाएगी। इसमें क्षेत्र के देवी-देवता भी भाग लेंगे। 22 और 25 नवंबर को प्रात रेणुका झील में स्नान करने का विशेष पर्व होगा। इस दौरान असंख्य श्रद्धालु रेणुका झील के पवित्र जल में स्नान करके पुण्य प्राप्त करेंगे।
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अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले का मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह दोपहर बाद देव पालकियों को कंधा देकर विधिवत शुभारंभ करेंगे। देवता की शोभायात्रा के साथ अंतरराष्ट्रीय रेणुका मेले का आगाज होगा। मुख्यमंत्री माइना बाग में हेलीकाप्टर से उतरने के बाद वहां पर 75 लाख की लागत से बनने वाले स्टेडियम का शिलान्यास करेंगे। रेणुका विकास बोर्ड के अध्यक्ष एवं सीपीएस विनय कुमार ने कहा कि मेले के दौरान श्रद्धालुओं की सुविधा के पुख्ता प्रबंध किए गए हैं।