नसबंदी के बावजूद शिमला शहर में बंदरों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। वन्य प्राणी विभाग की ओर से करवाए जा रहे सर्वे में शहर के कई हिस्सों में बंदरों के ऐसे ग्रुप मिले हैं जिनमें छोटे बच्चों की संख्या काफी ज्यादा है। इससे वन विभाग के नसबंदी करने के दावों की भी पोल खुल रही है।
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सर्वे शुरू हुए दो हफ्ते हो चुके हैं। इसमें स्पेशल टीमें बंदरों की संख्या के साथ इनके व्यवहार को स्टडी कर रहे हैं। यह सर्वे सभी 34 वार्डों में होना है। डेढ़ माह बाद इसकी रिपोर्ट तैयार हो पाएगी। अब तक के सर्वे में कुछेक ग्रुप ऐसे मिले हैं जिसमें छोटे बंदर काफी ज्यादा हैं।
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नए बंदरों की बढ़ती संख्या से साफ है कि शहर में अभी भी सैकड़ों ऐसे बंदर है जिनकी नसबंदी नहीं हो पाई है। हालांकि, कई ऐसे भी ग्रुप पाए गए हैं जिनमें इक्का-दुक्का ही बच्चे साथ हैं, यानि इनमें ज्यादातर बंदरों की नसबंदी की जा चुकी है। बहरहाल जो भी हो, नसबंदी के बावजूद शहर के लोगों को आने वाले दिनों में बंदरों के आतंक से राहत मिलती नहीं दिख रही।
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वहीं बंदरों के हमले से हर रोज अस्पताल इलाज करवाने पहुंच रहे हैं। आलम यह है कि बंदरों के झुंडों के पास से सामान लेकर चलना तक मुश्किल हो गया है। वन्य प्राणी विभाग डीएफओ राजेश शर्मा ने कहा कि बंदरों की नसबंदी न हो पाने के कई कारण हो सकते हैं।
यदि मादा बंदर गर्भवती हैं तो उसकी नसबंदी नहीं की जाती। इसे छोड़ना पड़ता है। बाद में इसकी नसबंदी हुई या नहीं, इसका पता लगाना मुश्किल रहता है। इसके अलावा कई बार ग्रुप में भी कुछ बंदर बिना नसबंदी के ही रह जाते हैं। इससे भी बंदरों की संख्या बढ़ रही है।