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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा: 16वीं सदी में ऐसे हुई थी शुरुआत, तस्वीरों में देखें देव संस्कृति का अनूठा महासंगम

Wed, 28 Oct 2020 06:26 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला नेटवर्क, कुल्लू/खराहल
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कुल्लू दशहरा - फोटो : अमर उजाला
हिमाचल प्रदेश का अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा देव संस्कृति का अनूठा महासंगम है। दशहरा उत्सव के रूप में इसकी पहचान देश-विदेश में है। उत्सव में सैकड़ों देवी-देवता शामिल होते हैं। इस बार 25 अक्तूबर को शुरू हुए सात दिवसीय कुल्लू दशहरे में इतिहास में पहली बार कोरोना के चलते भगवान रघुनाथ की रथयात्रा में मात्र आठ देवी-देवता और 200 देवलुओं, कारकूनों और राज परिवार के सदस्यों ने भाग लिया।  लेकिन कुल्लू में दशहरा उत्सव की शुरुआत 16वीं सदी में तत्कालीन राजा जगत सिंह के समय में हुई थी। 
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मुख्य छड़ीबरदार महेश्चर सिंह
 राजा ने अपना सारा राजपाठ रघुनाथ के चरणों में सौंप दिया था। खुद भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार बन गए। राजपरिवार इस परंपरा को आज भी बखूबी निभा रहा है। बताया जाता है कि भगवान रघुनाथ का आशीष लेने से राजा जगत सिंह का ब्रह्महत्या का दोष धुल गया था। राजा जगत सिंह को कुछ लोगों ने सूचना दी कि पार्वती घाटी के गांव टिप्परी में ब्राह्मण दुर्गादत्त के पास एक सेर सुच्चे मोती हैं। 
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कुल्लू दशहरा - फोटो : अमर उजाला
राजा ने हुक्म दिया कि मणिकर्ण से लौटते समय ब्राह्मण से मोती मांग लिए जाएंगे। दुर्गादत्त अपने मन ही मन सोचने लगा कि यह कैसा राजा जो मुझसे मोती मांग रहा है। वास्तव में उसके पास कोई मोती नहीं थे। लोगों ने ईर्ष्या स्वरूप उसकी शिकायत की थी। ब्राह्मण एक प्रसिद्ध ज्योतिषी भी था। उसने राजा के भय और डर से अपने घर को आग लगा दी और अपने पूरे परिवार को अग्नि के भेंट कर दिया। 

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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा
ब्रह्महत्या के फलस्वरूप राजा को भोजन में रक्त और कीडे़ नजर आने लगे। इस समस्या के समाधान के लिए राज दरबार में राज पुरोहित बुलाकर सुझाव मांगे। कुछ लोगों ने राजा को संदेश दिया कि नग्गर के पास एक महात्मा रहते हैं और केवल दूध का ही सेवन करते है। 
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा
 राजा ने महात्मा से इस समस्या के समाधान के लिए विनती की। महात्मा ने अपने शिष्य दामोदर दास को अयोध्या से रघुनाथ की मूर्ति को लाने को कहा। कुछ समय दामोदर दास अयोध्या में पुजारी का शिष्य बना। 
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भगवान रघुनाथ - फोटो : अमर उजाला
अयोध्या की पूरी जानकारी लेने के बाद मौका पाकर रघुनाथ की मूर्ति चुरा ले आया। वैदिक मंत्रों के साथ रघुनाथ की मूर्ति का स्नान किया गया। चरणामृत राजा को पिलाया गया। इसके बाद राजा को कष्ट से मुक्ति मिली थी। भगवान रघुनाथ के छड़ीबरदार महेश्वर सिंह का कहना है कि परंपराओं को आज भी निभाया जा रहा है।
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा - फोटो : अमर उजाला
 कुल्लू दशहरा के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है, जब मुख्यालय के सामने स्थित न्योली मंदिर में विराजमान देवता जुआणी महादेव उत्सव में शामिल नहीं हो पाए हैं। कोरोना के चलते दशहरा उत्सव कमेटी ने महज सात देवी-देवताओं को दशहरे में शामिल होने के लिए अनुमित दी है।
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कुल्लू दशहरा - फोटो : अमर उजाला
हालांकि बाद में पांच और देवता भी देव महाकुंभ में शामिल हुए। लेकिन पहली बार जुआणी महादेव दशहरा में शरीक नहीं हो रहे हैं। ऐसे में देवलुओं और हारियानों में भी काफी मायूसी दिख रही है।
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