पहाड़ों पर 30 वर्षों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग के साथ इसके लिए विशेषज्ञ पहाड़ों पर बन रहीं झीलों एवं बांधों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। आगे विस्तार से जानते हैं कि हिमाचल में क्यों हो रही तबाही और क्या हो सकता है इसका समाधान...
हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन से हर साल तबाही हो रही है। इसी मानसून 50 से ज्यादा जगह बादल फट चुके हैं। पहाड़ों पर 30 वर्षों में अत्यधिक बारिश की घटनाओं में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हो गई है। ग्लोबल वार्मिंग के साथ इसके लिए विशेषज्ञ पहाड़ों पर बन रहीं झीलों एवं बांधों को भी जिम्मेदार मान रहे हैं। उनका कहना है कि नब्बे के दशक में बादलों का फटना अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक सीमित था लेकिन अब ये घटनाएं निचले इलाकों में हर साल हो रही हैं। राज्य आपदा प्रबंधन के रिकॉर्ड के अनुसार साल 2018 से 2022 के बीच हिमाचल में बादल फटने की महज छह घटनाएं ही दर्ज हुई, जबकि बाढ़ की 57 व भारी भूस्खलन की 33 घटनाएं सामने आईं। वर्ष 2023 में तीन बड़ी घटनाओं में 8 से 11 जुलाई, 14-15 अगस्त और 22-23 अगस्त को हिमाचल में भारी नुकसान हुआ। इस दौरान इस दौरान में 6 जगह बादल फटे, 32 बाढ़ और 163 भूस्खलन की घटनाएं हुईं। पूरे मानसून सीजन के दौरान 45 जगह बादल फटे, बाढ़ की 83 और भूस्खलन की 5748 घटनाएं हुईं। साल 2024 की बरसात के दौरान बादल फटने की 14, भूस्खलन की तीन और बाढ़ की 40 घटनाएं दर्ज की गईं। इस मानसून सीजन में प्राकृतिक आपदाओं की इन रिकॉर्ड घटनाओं में जान माल का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है।आगे पढ़ें...
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कराहते पहाड़।
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हिमाचल में नदी-नालों के रास्तों में बस गए लोग, 13 साल में तय नहीं हो सके नो कंस्ट्रक्शन जोन
प्रदेश में नदी-नालों का रास्ता रोककर जगह-जगह निर्माण हो रहे हैं। आपदा के उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लोग बस गए हैं। केंद्र सरकार के निर्देशों के 13 साल बाद भी हिमाचल में नदी-नालों के आसपास नो कंस्ट्रक्शन जोन चिह्नित नहीं हो सके हैं। आपदाओं से बचाव के लिए केंद्र ने बाढ़ प्रबंधन और नदी- नालों के तटों की सुरक्षा के लिए साल 2012 में फ्लड प्लेन जोन अधिनियम लागू करने के निर्देश दिए थे। इसके तहत आपदा को लेकर उच्च, मध्यम और कम जोखिम वाले क्षेत्र तय कर निर्माण पर प्रतिबंध लागू किए जाने थे, लेकिन केंद्र सरकार के निर्देश हिमाचल में अब तक लागू नहीं हो पाए। दूसरी ओर, हिमाचल की तरह मिलती-जुलती भौगोलिक स्थिति वाले पड़ोसी राज्य उत्तराखंड ने 2013 में ही उत्तराखंड बाढ़ मैदान परिक्षेत्रण अधिनियम लागू कर दिया है। बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन से ऐसे ही क्षेत्रों में जानमाल का सर्वाधिक नुकसान हो रहा है।आगे पढ़ें...
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डीपीआर में खामियां, भूमि अधिग्रहण भी उपयुक्त नहीं, फिर सीधे काट दिए खड़े पहाड़
प्रदेश में फोरलेन सड़कों की डीपीआर और निर्माण में खामियां बरसात में तबाही का कारण बन रही है। पहले लागत बचाने के लिए जमीन का सही तरीके से अधिग्रहण नहीं किया और उसके बाद खड़े पहाड़ काट दिए। फोरलेन बनाने के लिए मैदानों में अपनाई जाने वाली तकनीक को पहाड़ों में लागू करने की चूक भारी पड़ रही है। अवैज्ञानिक तरीके से नब्बे डिग्री में पहाड़ की कटिंग से सड़कों के आसपास भारी भूस्खलन के साथ मकान जमींदोज हो रहे हैं। कटिंग से जर्जर हुए पहाड़ बरसात में दरक रहे हैं। बड़ी-बड़ी चट्टानें उखड़ रही हैं। आगे पढ़ें...
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पहाड़ों को खोद नदी-नालों के किनारे डंप कर दिया तबाही का सामान, जानें क्या बोले विशेषज्ञ
हिमाचल प्रदेश में मलबे को ठिकाने लगाने के लिए पंचायतों और शहरी निकायों के पास एक भी डंपिंग साइट नहीं है। बड़ी परियोजनाएं बना रहीं कंपनियों की कागजों में डंपिंग साइटें हैं, परंतु यहां भी नियमानुसार मलबे को ठिकाने नहीं लगाया जा रहा है। हिमाचल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पास ऐसे कई मामले पहुंचे हैं। प्रदेश हाईकोर्ट की ओर से नियुक्त किए गए एमिकस क्यूरी की अध्ययन रिपोर्ट में ऐसे कई खुलासे हुए हैं। पहाड़ों को खोदकर नदी-नालों, खड्डों के किनारे डंप किया मलबा तबाही का सामान बन गया है। राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण हो, बिजली परियोजनाएं हों या फिर अन्य विकास कार्य, कंपनियां टनों के हिसाब से मलबा नदी-नालों के किनारे डंप कर रही हैं। भारी बारिश में यह मलबा तबाही का कारण साबित हो रहा है। इससे भी बाढ़ की स्थिति पैदा हो रही है।आगे पढ़ें...
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सुरंगों-ब्लास्टिंग से जर्जर हो रहे पहाड़, अत्यधिक जल विद्युत दोहन दे रहा खतरे का संकेत
पन बिजली क्षमता हिमाचल प्रदेश के लिए नेमत है, लेकिन इसका अत्यधिक दोहन पहाड़ों को प्रभावित करने लगा है। चंबा से किन्नौर तक मानकों को ठेंगा दिखा रहे कई प्रोजेक्टों ने संवेदनशील पहाड़ों को गंभीर पर्यावरणीय संकट में डाल दिया है। सुरंगों, अवैज्ञानिक तरीके से ब्लास्टिंग, वन कटान और नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप के चलते पहाड़ों की भूगर्भीय स्थिरता कमजोर हो रही है। इससे भूस्खलन, बादल फटने और जलस्रोतों के सूखने जैसी घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। वर्ष 2024 में बादल फटने की सात घटनाओं में से चार जलविद्युत परियोजना क्षेत्रों में हुईं थीं। 2023 में कुल्लू, मलाणा और सैंज घाटी में कई आपदाएं आईं। किन्नौर संघर्ष समिति के अनुसार प्रदेश में कई जलविद्युत परियोजनाओं में पर्यावरणीय मानकों का पालन नहीं किया जा रहा। नदियों में आवश्यक न्यूनतम 10 फीसदी जल प्रवाह भी कई जगहों पर नहीं छोड़ा जा रहा, इससे डाउन स्ट्रीम में पारिस्थितिकी पर संकट गहराता जा रहा है। आगे पढ़ें...
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विकास मॉडल को नहीं बदला तो ढह जाएगा हिमालय, अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्य आपदा की मार झेल रहे हैं। हर बार सरकारें इसे मौसम की मार या जलवायु परिवर्तन का परिणाम बताकर बच निकलना चाहती हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि असली कारण है अनियोजित और बेतरतीब विकास। चेतावनी साफ है कि यदि विकास का मॉडल नहीं बदला तो आने वाले समय में हिमालयी इलाकों में आपदाएं और विकराल रूप लेंगी। एक समय ऐसा आएगा, जब धीरे-धीरे वह रहे हिमालय को बचाना मुश्किल होगा। भारतीय मौसम विज्ञान सोसायटी के अध्यक्ष एवं भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक आनंद शर्मा कहते हैं, पिछले एक दशक में पूर्वानुमान और मॉनिटरिंग की क्षमता में सुधार हुआ है। लेकिन जब तक चेतावनियों पर समय रहते स्थानीय प्रशासन और समाज प्रतिक्रिया नहीं करेगा, तब तक केवल मौसम को दोषी ठहराना व्यर्थ है। आगे पढ़ें...
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हिमाचल में पंडोह से मनाली तक फोरलेन पर भारी नुकसान, छह जगह सड़क का नामोनिशान नहीं; जानें
जीवन रेखा मानी जाने वाली सड़कें हिमाचल में कई जगह जीवन लील रही हैं। लोगों को बेघर कर रही हैं। कारण है पहाड़ के मिजाज को समझे बिना नियमों को दरकिनार कर बनाईं सड़कें। मंडी जिले के पंडोह से मनाली तक बना फोरलेन इसका जीता-जागता सबूत है। चंडीगढ़-मनाली नेशनल हाईवे का यह हिस्सा तीन साल में ही ध्वस्त हो गया। इसमें सबसे बड़ा कारण फोरलेन तैयार करने के लिए पहाड़ों की गई 90 डिग्री में की गई खोदाई। ऐसी खोदाई से भारी बरसात में पहाड़ जगह-जगह दरक रहे हैं। कई परिवार उजड़ गए। लोगों के घर टूट गए तो कई टूटने के कगार पर हैं। लोग अपने घर छोड़कर दूसरी जगह शरण लिए हुए हैं। आगे पढ़ें...
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उखड़ते-कटते पेड़ों ने भी दिया आपदा को न्योता... बरसात में नदी-नाले खोल रहे पोल
हिमाचल में उखड़ते-कटते पेड़ भी आपदा को न्योता दे रहे हैं। हिमाचल के हरित क्षेत्र को उत्तर भारत के फेफड़े कहा जाता है, लेकिन लापरवाही के चलते ये लगातार कमजोर हो रहे हैं। वर्षों से पहाड़ों की मिट्टी को मुट्ठी में थामे ये पेड़ बेरहमी से कट रहे हैं। वैध और अवैध दोनों ही तरीकों से पेड़ों के कटने का सिलसिला दशकों से चल रहा है। विकास परियोजनाओं के लिए भी जो पेड़ कटान हो रहा है, उसकी क्षतिपूर्ति के लिए उस अनुपात में नए पौधे नहीं लग रहे। विशेषज्ञों के अनुसार बादल फटने, बाढ़ और भूस्खलन की घटनाओं का यह भी बड़ा कारण है। भारी बारिश-बादल फटने के बाद रावी-ब्यास नदी और अन्य नालों में हाल ही में बहकर आईं हजारों टन लकड़ियों ने पहाड़ों की हालत की तस्वीर पेशकर इसकी पोल भी खोल दी। हालांकि वन विभाग इसे अवैध कटान मानने को तैयार नहीं। हिमाचल के नदी-नालों में बहकर आए पेड़ों के वीडियो देखकर सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे प्रथमदृष्टया अवैध वन कटान माना है। आगे पढ़ें...
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हिमाचल की कुल्लू घाटी के पांच नाले मनाली से लेकर पंजाब तक मचा रहे तबाही, अध्ययन में खुलासा
हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी के पांच नाले हर साल मनाली से लेकर मैदानी इलाकों तक भारी तबाही मचा रहे हैं। इन नालों में बाढ़ आने से व्यास नदी रौद्र रूप दिखा रही है। भारी बारिश और बादल फटने से फोजल, सरवरी, कसोल, हुरला और मौहल नालों में हर बरसात में बाढ़ आने से ब्यास नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। इससे उफनती ब्यास मनाली से पंजाब तक तबाही मच रही है। लगातार ऐसा हो रहा है। कुल्लू के मोहल में स्थित जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण अनुसंधान संस्थान मौहल के अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। आगे पढ़ें...
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कराहते पहाड़।
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अवैज्ञानिक तरीके से खनन, बिना योजना बनी सड़कों और अवैध डंपिंग ने मचाई सराज में तबाही
सराज क्षेत्र में 30 जून को आई प्राकृतिक आपदा से हुए विनाश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके पीछे प्राकृतिक कारणों से ज्यादा मानवीय लापरवाही जिम्मेदार रही। अवैज्ञानिक खनन, बिना योजना के बनी सड़कें और अवैध डंपिंग ने पारिस्थितिक संतुलन को इतना बिगाड़ा कि बादल फटने, भूस्खलन जैसी घटनाओं ने सात लोगों की जान ले ली। 21 लोग अभी भी लापता हैं। आपदा ने सैकड़ों घरों, दुकानों, स्कूलों व सड़कों को मलबे में बदल दिया। थुनाग, बगस्याड़, जरोल, कुथाह, बूंगरैलचौक और पांडवशीला जैसे इलाके सबसे ज्यादा प्रभावित हुए, जहां दो महीने बाद भी 266 किलोमीटर सड़कें बंद पड़ी हैं।आगे पढ़ें...
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हिमाचल मंत्रिमंडल की बैठक।
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अमर उजाला असर: हिमाचल में नदी-नालों के किनारे नहीं होगा निर्माण, गांव में नक्शे के तहत बनेंगे भवन
हिमाचल प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में अब नदी-नालों के किनारे निर्माण कार्य नहीं होंगे। गांव में भी नियमों के तहत नक्शों की मंजूरी के बाद भवनों का निर्माण किया जा सकेगा। राज्य मंत्रिमंडल ने सोमवार को कैबिनेट की बैठक में ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाबद्ध निर्माण गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए मॉडल उप नियमों को मंजूरी दी है। इसके तहत पंचायतों में तकनीकी सहायक नक्शे की जांच-पड़ताल करेंगे या फिर इसके लिए किसी जांच एजेंसी भी हायर किया जाएगा। इसके बाद भवनों के नक्शों को स्वीकृति के लिए ग्रामसभा में लाया जाएगा। राज्य मंत्रिमंडल ने यह निर्णय हाल के मानसून सीजन के दौरान हुई भारी तबाही को ध्यान में रखते हुए लिया है। अमर उजाला के ‘कराहते पहाड़’ अभियान के बीच राज्य मंत्रिमंडल ने यह फैसला लिया है।आगे पढ़ें...
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अवैध डंपिंग।
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एनएच के किनारे अवैध डंपिंग की जांच के आदेश, अमर उजाला ने प्रमुखता से उठाया था मुद्दा
हिमाचल प्रदेश में फोरलेन-नेशनल हाईवे (एनएच) और अन्य सड़कों के किनारे की गई मलबे की अवैध डंपिंग की जांच होगी। कीरतपुर-मनाली फोरलेन निर्माण के दौरान डंप किया मलबा भारी बारिश होने पर ब्यास में बहकर आया था। इससे बाढ़ की स्थिति बनी और भारी जानमाल का नुकसान हुआ। अब ब्यास की ड्रेजिंग कर मलबा और गाद निकाली जाएगी, ताकि नदी का रास्ता साफ हो सके। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई), सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के कार्यों को देखने के लिए बनाई गई विशेष टास्क फोर्स की बैठक में यह फैसला लिया है। अमर उजाला ने कराहते पहाड़ अभियान के तहत अवैध डंपिंग के मामले को प्रमुखता से उठाया था। आगे पढ़ें...
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अवैध खनन(सांकेतिक)
- फोटो : संवाद
अवैध खनन हिमाचल में आपदा का बड़ा कारण, पंजाब, उत्तराखंड की सीमाओं पर भी खूब फल-फूल रहा माफिया
प्रदेश में आपदा से तबाही का खनन भी बड़ा कारण है। प्रदेश में कई वर्षों से अवैज्ञानिक तरीके और अवैध खनन से हिमाचल के नदी-नालों और खड्डों को खोखला किया जा रहा है। इससे नदी-नाले रास्ते बदल रहे हैं, जो बरसात में तबाही का कारण बन रहे हैं। सतलुज, ब्यास, यमुना, चिनाब बेसिन के अलावा कई नदी-नालों में बड़े पैमाने पर अवैध के मामले सामने आए हैं। आईआईटी पुणे की रिसर्च रिपोर्ट में भी हिमाचल में अवैज्ञानिक खनन को आपदा में भारी नुकसान के लिए जिम्मेदार माना गया है। आपदा के कारणों का अध्ययन करने हिमाचल पहुंची केंद्रीय टीम ने भी अवैज्ञानिक तरीके से खनन को आपदा में भारी नुकसान का एक कारण माना है। आगे पढ़ें...
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मुख्य सचिव प्रबोध सक्सेना
- फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
आपदा से सबक, नदी-नालों से प्लॉट कितनी दूर, ततीमे में करना होगा जिक्र; जानें विस्तार से
हिमाचल में आपदा से सबक लेते हुए भवन निर्माण के नियमों का पालन करवाने के लिए प्रदेश सरकार सख्त हो गई है। अब भवनों के नक्शे पास कराने के लिए राजस्व विभाग से लिए जाने वाले प्लॉट के ततीमे में अब नदी-नालों का भी जिक्र करना होगा। प्लॉट से नदी या नाला कितनी दूरी पर है, बाकायदा इसे ततीमे में दर्शाना होगा। उचित दूरी पर प्लॉट होने के बाद ही नक्शे को मंजूरी दी जाएगी। प्रदेश सरकार ने नदी से 7 और नालों से पांच मीटर की दूरी पर भवन निर्माण करने की अनुमति दी है। इसके साथ ही सरकारी भवनों और परियोजनाओं का निमार्ण नदी-नालों से डेढ़ सौ मीटर की दूरी पर होगा। आगे पढ़ें...
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धर्मपुर बस अड्डा।
- फोटो : संवाद
बस अड्डा धर्मपुर : अस्तित्व में आने के बाद तीन बार झेल चुका आपदा, 2015 और 2023 में भी हुआ था जलमग्न
जिला मंडी के धर्मपुर बस अड्डे को एक बार फिर आपदा का सामना करना पड़ा है। अस्तित्व में आने के 13 साल के अंदर धर्मपुर बस अड्डे को बार-बार बाढ़ का दंश झेलना पड़ रहा है। बावजूद इसे अन्य किसी सुरक्षित स्थान पर करने की कवायद शुरू नहीं हो पाई है। वहीं, अब सरकार ने निर्णय लिया है कि यहां से बस अड्डे को किसी अन्य स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाएगा। सितंबर 2012 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बस अड्डे का उद्घाटन किया गया था। बाद में तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में ग्राउंड फ्लोर के निर्माण का कार्य पूरा किया। आगे पढ़ें...
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जल विद्युत।
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हिमाचल : ब्यास नदी पर बिजली प्रोजेक्टों के लिए सख्त होंगे नियम, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का होगा अध्ययन
हिमाचल प्रदेश में ब्यास नदी पर प्रस्तावित और चल रहीं जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर राज्य सरकार ने नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में आईं प्राकृतिक आपदाओं, भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाओं को ध्यान में रखते हुए अब इन परियोजनाओं के नियमों को और सख्त किया जाएगा। अमर उजाला की ओर से कराहते पहाड़ अभियान के तहत जल विद्युत प्रोजेक्टों के बढ़ रही प्राकृतिक आपदाओं को प्रमुखता से उठाने के बाद ऊर्जा निदेशालय ने ब्यास बेसिन पर परियोजनाएं स्थापित करने के लिए बड़ा बदलाव करने की कवायद शुरू की है। आगे पढ़ें...
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कराहते पहाड़।
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100 से अधिक जगह भूस्खलन ने बदल दी 97 किमी हाईवे की सूरत, एनएच को 120 करोड़ का भारी नुकसान
मानसून सीजन में भारी बारिश, बाढ़ और भूस्खलन ने सिर्फ घरवार, जमीनों, दुकानों, खेत खलिहानों को नुकसान पहुंचाया, बल्कि जीवनरेखा कही जाने वाली सड़कों को भी गहरे जख्म दिए हैं। चारों तरफ भारी बारिश ने तबाही मचा दी है। जिला कुल्लू की लाइफलाइन दो हाईवे को सबसे ज्यादा क्षति पहुंची। यह हाईवे न केवल जिला को आपस में जोड़ते हैं, बल्कि अन्य राज्यों को भी इन्हीं से आवाजाही रहती है। कुल्लू-मनाली हाईवे 23 जगह भूस्खलन हुआ या ब्यास नदी की जद में आ गया। वहीं 97 किमी लंबा औट-बंजार-सैंज हाईवे-305 पर भी 100 से अधिक जगह भारी भूस्खलन हुआ है। लारजी डैम से लेकर लुहरी-सैंज तक भूस्खलन ने हाईवे की सूरत ही बदलकर रख दी है। आगे पढ़ें...
हड़सर में पहाड़ से गिरे पत्थरों में दफनवाहन। (फाइल फोटो)।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
दुकानें-लंगर लगाने की जगह बिखरीं चट्टानें, टूटा-फूटा हाईवे और वाहन दे रहे तबाही की गवाही
टूटी-फूटी कारें अब भी मलबे में आधी दबी खड़ी हैं। हड़सर से डल झील तक का रास्ता ऐसा लगता है मानो कभी यहां से आस्था के लाखों कदमों वाली पदयात्रा गुजरी ही न हो। चारों तरफ बिखरे पत्थर, गिरा मलबा और सूना पड़ा रास्ता बता रहा है कि प्राकृतिक आपदा ने इस बार मणिमहेश यात्रा में किस तरह कहर बरपाया। नाले इतने उफान पर आए कि रास्तों को बहा ले गए। अब पानी भले ही कम हो गया हो, लेकिन नालों का दायरा नदी के बराबर दिखता है। जहां अस्थायी दुकानें और लंगर स्टॉल लगते थे, वहां अब सिर्फ चट्टानें और ढही हुई मिट्टी है। आगे पढ़ें...