देवी-देवताओं का महाकुंभ अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव सोमवार को लंका दहन की परंपरा के साथ संपन्न हुआ। अधिष्ठाता देवता भगवान रघुनाथ सहित प्रमुख देवी देवताओं ने लंका दहन की परंपरा में हिस्सा लिया।
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दशहरा के अंतिम दिन देवी देवताओं तथा राजपरिवार के द्वारा सभी रस्मों का निर्वहन किया गया। बाद में सभी देवता लाखों श्रद्घालुओं की जय जयकार के बीच वापस लौट गए।
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भगवान रघुनाथ पालकी में सवार होकर बिजली महादेव, ज्वाणी महादेव, माता ज्वाला फोजल, सोयल की माता कोटली, भारका खंडासन, भोष के देवता वीरनाथ, खखनाल की माता पार्वती व कार्तिक स्वामी, घुड़दौड़ के देवता गणेश, सजला के देवता विष्णु, नग्गर की माता त्रिपुरा सुंदरी, बड़ाग्रां का माता सिंघासन, बारी पधरू के देवता गौहरी आदि देवता सुल्तानपुर स्थित मंदिर के लिए रवाना हुए।
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करीब 3.50 बजे अधिष्ठाता भगवान रघुनाथ रथ में सवार होकर लंका दहन के लिए रवाना हुए। ढोल नगाड़ों की थाप पर सभी देवी देवता ढालपुर के कैटल मैदान पहुंचे। रथयात्रा के दौरान पूरा मैदान जय श्रीराम के जयकारों से गूंज उठा।
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राजपरिवार की कुलदेवी माता हिडिंबा, माता दोचा मोचा, माता शरबरी सहित अन्य देवियां सबसे पहले लंका की रस्म के लिए पहुंचे।
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लंका बेकर स्थित एक जगह पर लंका दहन की परंपरा को निभाया गया। लंका पर विजय पाने के बाद भगवान रघुनाथ देवी-देवताओं के साथ वापस मंदिर की ओर निकले।
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हालांकि दशहरा उत्सव में शामिल होने के लिए 227 देवी देवता शामिल हुए थे, लेकिन लंका दहन में करीब दो दर्जन देवी-देवताओं ने हिस्सा लिया। वहीं देव महाकुंभ के इस नजारे को देखने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।