हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की हार सत्ता विरोधी ट्रेंड, चुनाव की कमजोर रणनीति जैसे कई कारणों से हुई। कांग्रेस आलाकमान ने राज्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय मंत्रियों की सक्रियता को देखते हुए मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को फ्री हैंड तो दिया, मगर उनके कहने पर टिकट आवंटन नहीं किया।
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गुड़िया, होशियार सिंह मामलों सहित कानून-व्यवस्था के कई मुद्दे भी सरकार के खिलाफ गए।
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कांग्रेस घोषणापत्र में कई लोक लुभावनी घोषणाएं की गईं, मगर प्रदेश के कर्मचारी और आमजन इसके लोभ में नहीं आए।
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वीरभद्र सिंह के नेतृत्व में पहली बार सरकार 1983 में बनी। 1985 में उनके नेतृत्व में चुनाव लड़े गए तो वह 1990 तक मुख्यमंत्री रहे। 1990 में भाजपा की सरकार सत्ता में आई। उसके बाद कांग्रेस दोबारा रिपीट नहीं कर पाई। वीरभद्र सिंह को कांग्रेस हाईकमान ने इस बार भी मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किया। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू कई बार उनके निशाने पर रहे। यानी कांग्रेस में अंदरूनी फूट साफ दिखती रही।
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टिकटों के आवंटन में वीरभद्र सिंह अपने विरोधियों का कतई हस्तक्षेप नहीं चाह रहे थे। इसके बावजूद सुक्खू सहित राज्यसभा में विपक्ष के उपनेता आनंद शर्मा, पूर्व सांसद विप्लव ठाकुर जैसे कई नेताओं ने इसमें हस्तक्षेप किया। नतीजे में एक दर्जन से अधिक ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिए गए, जिनका वीरभद्र खुद विरोध करते रहे मगर उनकी अनसुनी हुई।
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मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपने बेटे विक्रमादित्य सिंह को विधानसभा की दहलीज को पार करवाने में कामयाब हुए। बेटे के कै रियर की चिंता से जहां वे मुक्त हुए, वहीं उन्होंने खुद के लिए नए चुने अर्की विधानसभा क्षेत्र से भी चुनाव जीत लिया।
चुनाव में जहां सीएम वीरभद्र सिंह के सियासी विरोधी जैसे नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल, अपनी ही पार्टी में विरोध में रहते आए मंत्री कौल सिंह ठाकुर और जीएस बाली हार गए, वहीं वीरभद्र के करीबी मंत्रियों ठाकुर सिंह भरमौरी और सुधीर शर्मा को भी हार का सामना देखना पड़ा। हालांकि, पिछले पांच साल में वीरभद्र के आमने-सामने रहे कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सुखविंद्र सिंह सुक्खू को उनकी परंपरागत नादौन सीट से चुनाव लड़ने के बाद संजीवनी मिली है। भाजपा के गढ़ में सुक्खू की ये जीत उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने के लिए जरूरी थी।