महात्मा गांधी की हत्या के बाद भाग रहे नाथुराम गोडसे को एक सिपाही ने पकड़ तो लिया, मगर बाद में उसके साथ क्या क्या हुआ, ये कोई नहीं जानता। गोडसे को पकड़ने वाला वो जांबाज सिपाही एक बड़ी साजिश का शिकार हो गया था। रिपोर्ट: अशोक केडियाल
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ये जांबाज सिपाही हिमाचल के नाहन का रहने वाला देवराज सिंह था। डीके सिंह के नाम से मशहूर देवराज ने 30 जनवरी 1948 की शाम को दिल्ली के बिरला मंदिर की प्रार्थना सभा में मौजूद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर गोली दागने वाले नाथूराम गोडसे को धर दबोचा था।
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परिवार के सदस्य बताते हैं कि उस दौरान देश के समाचार पत्रों में नाथूराम को पकड़ने की खबर चित्रों सहित प्रकाशित हुई थी, लेकिन इस ऐतिहासिक घटना के बाद देवराज सिंह के खिलाफ बड़ी साजिश रची जाने लगी थी।
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बीमारी के चलते उन्हें इंडियन एयर फोर्स से 5 जनवरी 1955 को डिस्चार्ज कर दिया गया और उन्हें डिसएब्लिटी पेंशन के रूप में 115 रुपये दिए जाने लगे। उन्हें 15 अगस्त 1953 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने अशोक चक्र (द्वितीय श्रेणी) से सम्मानित किया था, लेकिन उन्हें इसके बाद पूरी जिंदगी परेशानी एवं बीमारी के जूझने में गुजारी।
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पहले 25 रुपये मासिक फिर बाद में मिलिट्री आफ होम अफियर्स ने 65 रुपये पेंशन कर दी। 10 मई 1987 को जांबाज देवराज सिंह 69 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गए। उस दौरान उन्हें 399 रुपये पेंशन मिलती थी। उनकी अंत्येष्टि के दौरान भी मात्र दो जवान सरीक हुए थे। जिन्हें नाहन की नागरिक सभा द्वारा बुलाया गया था।
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देवराज सिंह का जन्म 21 जनवरी 1918 को गुलाम भारत के नाहन शहर में हुआ था। वह बचपन से ही साहसी, कर्मठ तथा इमानदार थे। 1939 में उन्होंने वायु सेना में नौकरी की। 1942 में सिरमौर रियासत में शुरू हुए प्रजामंडल आंदोलन में बढ़चढ़ कर भाग लिया। जिस कारण उन्हें सेना से हटा दिया गया। आगे चलकर उन्होंने गांधी के हत्यारे को धर दबोचा था।
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माता राजेंद्रवती के कहने पर उन्होंने दोबारा सेना ज्वाइन की। वह 1948 में फ्लांइग सार्जेंट के पद पर तैनात थे तो उनकी जिंदगी में विश्व की सबसे बड़ी घटना घटी। दिल्ली के बिरला मंदिर प्रार्थना सभा में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर गोली दागने वाले गोडसे को धर दबोचा।
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नाहन के अपर स्ट्रीट मोहल्ले में देवराज सिंह के मकान में रह रहे पुत्रवधु सुमित्रा देवी एवं पोते विजय ठाकुर ने कहा कि गोडसे को दबोचने के 65 साल बाद भी देवराज सिंह को राष्ट्रीय स्तर की पहचान नहीं मिली। अपने दादा की उपलब्धियों को अपने पास संजोकर रखे विजय ठाकुर के पास अशोक चक्र, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रकाश के साथ देवराज सिंह की ली गई दुर्लभ फोटो सहित पेंशन पट्टा आज भी सुरक्षित मौजूद हैं।
बहू सुमित्रा देवी ने कहा कि केंद्र और प्रदेश सरकार देवराज सिंह की स्मारक यदि सिरमौर में बनाएं तो इससे उन्हें नई पहचान मिलेगी। साथ ही इतिहास के पन्नों में गुम उनके ससुर को करोड़ों भारतीय जान सकेंगे।