सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने कहा कि वह एचपीयू के दीक्षांत समारोह में दीक्षांत उद्बोधन करते हुए खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। भावुक लहजे में उन्होंने कहा कि यह लम्हा उन्हें जिंदगी भर याद रहेगा।
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समारोह में डिग्री और गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाले छात्रों को बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि मैंने जिंदगी में कभी गोल्ड मेडल नहीं लिया, मैं मुख्य न्यायाधीश बन गया, तो आप तो गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाले हो, आपका भविष्य और भी उज्ज्वल है।
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उन्होंने डाक्टर ऑफ लॉ मानद उपाधि दिए जाने पर विश्वविद्यालय का आभार जताते कहा कि अब वे इस यूनिवर्सिटी के एलयूमनई हो गए हैं। उन्होंने प्रदेश के शांत और आपसी भाईचारे की जीवन शैली और माहौल की जमकर तारीफ की।
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उन्होंने कहा कि हिमाचल की कुछ खूबियां हैं, जो इसे अन्य राज्यों से अलग करती हैं। यहां के सुंदर और आत्मसम्मानी लोगों ने कभी भी धर्म-जाति को लेकर माहौल खराब नहीं होने दिया।
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कभी भी यहां कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी नहीं हुई। उन्होंने कहा कि इस राज्य में कभी ऐसी समस्याएं खड़ी भी नहीं होंगी, क्योंकि यहां के लोग जानते हैं कि विकास को गति देने और आगे बढ़ने के लिए शांति बेहद जरूरी है।
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न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने देश के विकास में कुल आबादी के 65 फीसदी हिस्से युवाओं के योगदान की सराहना की, जो अपना काम कर देश को आगे ले जा रहे हैं। हमारा संविधान सामाजिक न्याय, आर्थिक और राजनीतिक न्याय का अधिकार देता है। जिसमें हर जाति, वर्ग, धर्म और रंग भेद के सभी को एक समान आगे बढ़ने के अधिकार दिए गए हैं।
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सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने कहा कि सामाजिक एवं आर्थिक असमानता से युक्त समाज में संवैधानिक उद्देश्यों को पूरा करना आसान नहीं है। दोषमुक्त और तीव्र न्याय दिलाना उस स्थिति में एक दूर का सपना हो जाता है, जबकि हमारा देश विकास के मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है और जिसे जस्टिस डिलीवरी प्रणाली में भी उसी तरह के विकसित की जरूरत है।
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लोकतंत्र के तीन स्तंभों विधानपालिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के सामने कई चुनौतियां हैं। हर साल गरीबों की संख्या बढ़ रही है। आर्थिक विकास को यदि अलग रखें तो देश में साफ पेयजल, न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा, शिक्षा और बेरोजगारी की समस्या गंभीर बनी हुई है। सरकारी क्षेत्र में रोजगार कम हुआ है।
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सीजेआई ने कहा कि न्यायपालिका के समक्ष लोगों को न्याय दिलाने में अलग तरह की चुनौतियां हैं। निष्पक्ष और तुरंत न्याय की कल्पना करना सही नहीं है। देश उल्लेखनीय प्रगति के दौर से गुजर रहा है, इसलिए न्यायिक व्यवस्था को इसके मुताबिक ढालना होगा। अन्य देशों की तरह मध्यस्थता अहम किरदार हो सकता है। सभी सिविल मामलों के कोर्ट में जाने से पूर्व मध्यस्थता से निपटाना होगा। राज्य सरकारों को एडीआर सेंटर में पूरी तरह से प्रशिक्षित मीडिएटर तैनात करने होंगे।
सीजेआई ने कहा कि विधानपालिका के समक्ष आजादी के 70 साल बाद भी बड़ी चुनौती है। टैक्स बैंकिंग, ट्रेड पॉलिसी, टेलीकॉम, ढांचागत विकास में निवेश, कारपोरेट और अप्रत्यक्ष करों की नीतियों के साथ आज भारत विश्व के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। 700 मिलियन स्मार्ट फोन उपभोक्ता, 332 मिलियन इंटरनेट यूजर के साथ भारत में आधार कार्ड जैसी सुविधाओं के चलते ऑनलाइन भुगतान जैसी सुविधाएं मोबाइल फोन से संभव हो रही हैं। लेकिन यह एक ही पहलू है। 1950 में शुरू किया भूमि सुधार प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है।