गांवों में आमतौर पर चूल्हों पर खाना बनाया जाता है। इसके लिए लकड़ियों और गोबर के उपलों का इस्तेमाल किया जाता है। बढ़ती महंगाई के बीच ये तरीका काफी सस्ता है। हालांकि खाना बनाने के बाद चूल्हे से निकलने वाली राख अब सस्ती नहीं रही। चूल्हे को जिस राख को हम यूं ही फेंक देते हैं, वो राख ऑनलाइन बाजार में बादाम के बराबर रेट पर बिक रही है। बाजार में जितना दाम 250 ग्राम बादाम का है उतना ही 250 ग्राम राख का भी है। बड़ी-बड़ी कंपनियों से इस राख को डिशवॉश और फर्टिलाइजर के तौर पर खरीदा जा रहा है, वो भी अलग-अलग पैकिंग और दाम पर। तमिलनाडु की केआरवी नेचुलर एंड आर्गेनिक, अहमदाबाद के ओसकास ग्रुप ‘द एश’ और ग्रीनफील्ड ईको सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड जोधपुर सरीखी कई कंपनियां दिग्गज ऑनलाइन साइट्स पर 250 ग्राम से लेकर 9 किलो तक की आकर्षण पैकिंग में लकड़ियों की राख बेच रही है। इन पर भारी छूट भी दी जा रही है।
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चूल्हे की राख
- फोटो : फाइल फोटो
एक कंपनी 250 ग्राम वुड ऐश 160 रुपये में बेच रही है जबकि उसकी कीमत 399 रुपये लिखी गई है। छूट के बाद जो कीमत आ रही है इतने में 250 ग्राम बादाम आ जाते हैं। डिस्काउंट न हो तो इसका दाम पिस्ता, काजू और अखरोट को भी मात दे दे।
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ऑनलाइन बिक रही राख
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
दूसरा ग्रुप 199 रुपये किलो राख बेच रहा है, जबकि कीमत 300 रुपये है। वहीं एक अन्य कंपनी 9 किलो की पैकिंग 850 रुपये में मुहैया करवा रही है। इस वुड एश को फल-सब्जियों के लिए बेहद लाभदायक बताया जा रहा है।
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ऑनलाइन बिक रही राख
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इसमें पोटैशियम, कैल्शियम, फास्फोरस, एल्युमीनियम, मैग्नीशियम, सोडियम, माइक्रो न्यूट्रेंट, कॉपर, सल्फर और जिंक प्रचुर मात्रा में होने का दावा किया जा रहा है। इसे सब्जियों और फलों की खेती के लिए उत्तम बताया जा रहा है। वहीं कंपनी इसे डिशवॉश के तौर पर बेहतर बता रहा है।
गांवों में लौट रहा चूल्हा कल्चर
एलपीजी की आसमान छूती कीमतों ने ग्रामीणों को एक बार फिर चूल्हा कल्चर की ओर मोड़ दिया है। ग्रामीण लकड़ी, उपलों से चूल्हों पर खाना बनाने को तवज्जो देने लगे हैं। कपूरथला के समीपवर्ती गांव धालीवाल दोनां निवासी दलजीत कौर बताती हैं कि महंगाई की मार ने तो पहले की कमर तोड़ रखी है। ऊपर से एलपीजी सिलिंडर खरीदना अब जेब पर भारी पड़ रहा है। अब उन्होंने फिर से गोबर के उपले बनाने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने बताया कि गांवों में चूल्हे से लोग दूर नहीं हुए हैं। अब भी कुछ घरों में चूल्हा जरूर जलता है। नई पीढ़ी में इसका प्रचलन कम है।