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भारतीय कंपनी ने बनाई अफगानिस्तान की संसद

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अफगानिस्तानी संसद का निर्माण भारत-अफगानिस्तान के मित्रता और सहयोग के प्रतीत के तौर पर किया गया। इसका निर्माण केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (सीपीडब्ल्यूडी) ने कराया। इसके निर्माण में 600 करोड़ रुपये की लागत आई।
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अफगानिस्तान में लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद दार-उल-अलम को तालिबानी आतंकियों ने बम धमाके से उड़ा दिया था। जिसके बाद उसकी हालत कुछ ऐसी हो गई थी। जिसके बाद सीपीडब्ल्यूडी को इसके निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी गई।
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इस बम धमाके ने अफगानिस्तान की संसद को जमीन पर ला दिया, जिसके बाद संसद की नई इमारत के निर्माण की जरूरत महसूस हुई तो अफगानिस्तान सरकार ने साल 2004 के मार्च महीने में एक प्रस्ताव रखा।

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इस प्रस्ताव को संसद ने सर्व सम्मति से पास कर दिया जिसके बाद अगस्त 2005 में इसकी पहली नींव रखी गई। उस वक्त के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इसकी इबारत रखी थी।
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भारत ने अफगानिस्तानी संसद के निर्माण का बेड़ा उठाया जिसके बाद अक्टूबर 2005 में इसके निर्माण स्थल का चुनाव किया गया।
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इस दिशा में तेजी से कई प्रक्रिया की गई लेकिन अगस्त 2006 में अफगानिस्तान सरकार को कुछ नई जरूरतें महसूस हुई जिसके बाद फिर से इसका एक नया प्लान बनाया गया।
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इसके अगले साल जुलाई 2007 को संसद के निर्माण का टेंडर जारी किया गया लेकिन जिन 10 कंपनियों ने टेंडर भरे थे वह अपना प्लान अगस्त तक सामने नहीं रख पाए।

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इसके बाद 2008 में अफगान कैबिनेट ने इमारत के निर्माण की समय सीमा तय कर दी जो नवंबर 2011 थी। लेकिन इसके निर्माण में हुई देरी की वजह से इसकी समय सीमा बढ़ाकर दिसंबर 2013 कर दिया गया।

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इस इमारत के निर्माण में उपयोग में लाए जाने वाले समंगम पत्थर (स्थानीय स्तर पर पाया जाने वाला पीला संगमरमर) आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाने की वजह से दिसंबर 2012 में इसमें सफेद संगमरमर लगाने का फैसला किया गया।

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इस नए फैसले की वजह से इसके निर्माण का कार्यकाल और बढ़ गया जिसे मार्च 2014 कर दिया गया लेकिन इसके बावजूद भी कुछ काम बाकी रह गया।

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आखिरकार 25 दिसंबर 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नए संसद भवन का उद्धघाटन कर इसे अफगानिस्तान की जनता को समर्पित किया।
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अफगान संसद को बनाने में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले लोगों के साथ मोदी।
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