शोले की शूटिंग के दौरान हेमा मालिनी के साथ बार-बार सीन करने के लिए धर्मेंद्र लाइट ब्वॉय को पैसे देकर अपने सीन खराब करा लेते थे। ताकि धर्मेंद्र को हेमा के साथ रोमांस का ज्यादा मौका मिल जाए।
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'शोले' के 40 साल पर पढ़िए, फिल्म की 40 दिलचस्प बातें
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गब्बर सिंह की खाकी वर्दी को मुंबई के चोर बाजार से खरीदा गया था। गब्बर को गंदे डाकू का लुक देने के लिए पूरी शूटिंग के दौरान वर्दी को एक भी बार नहीं धुला गया।
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गब्बर नाम का डाकू सचमुच में चम्बल घाटी में हुआ था। उसके जीवन पर जया भादुड़ी के पिता ने 'अभिशप्त चम्बल' नामक किताब लिखी थी। वह पुलिसवालों को पकड़ कर नाक कान काट कर छोड़ देता था। फिल्म का गब्बर उसी से प्रेरित था।
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कहा जाता है कि अभिनेता सचिन को इस फिल्म में अभिनय के मेहनताने के तौर पर बस एक फ्रिज मिला था।
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शूटिंग के दौरान अमजद खान बेहद नर्वस थे। पहले शॉट के लिए ही उन्हें 40 रिटेक देने पड़े। उनकी आवाज भी यूनिट वालों को पसंद नहीं आई। उन्हें बाहर करने पर भी विचार किया गया था।
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फिल्म की कहानी जब धर्मेन्द्र ने सुनी तो उन्हें ठाकुर का रोल दमदार लगा क्योंकि कहानी ठाकुर और गब्बर के लड़ाई के बीच की है। उन्हें वीरू के रोल में ज्यादा दम नजर नहीं आया। रमेश सिप्पी को तरकीब सूझी। उन्होंने धर्मेन्द्र से कहा कि ठाकुर को तो फिल्म में रोमांस करने का मौका ही नहीं मिलेगा जबकि वीरू के हीरोइन हेमा मालिनी के साथ कई रोमांटिक सीन हैं। धर्मेन्द्र का दिल उस समय हेमा पर आया हुआ था। संजीव कुमार भी हेमा को पसंद करते थे। सिप्पी ने कहा कि वे वीरू का रोल संजीव कुमार को दे देंगे। तरकीब काम कर गई और धरम पाजी वीरू का किरदार निभाने के लिए राजी हो गए।
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'शोले' के 40 साल पर पढ़िए, फिल्म की 40 दिलचस्प बातें
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हेमा मालिनी के साथ रोमांटिक सीन करते समय धर्मेन्द्र जानबूझ कर गलतियां करते थे ताकि रीटेक हो और उन्हें हेमा के साथ ज्यादा वक्त गुजारने का अवसर मिले। जब यह बात समझ में आ गई कि गरम धरम जानबूझ कर ये हरकतें कर रहे हैं तो धरम ने दूसरी चाल चली। वे यूनिट मेंबर्स को गलतियां करने के बदले में पैसे देते थे।
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कहा जाता है कि शोले की शूटिंग के कुछ दिनों पहले संजीव कुमार ने हेमा मालिनी के आगे शादी का प्रस्ताव रखा था, जिसे हेमा ने ठुकरा दिया था। इसी वजह से ‘शोले’ में दोनों के बीच दृश्य नहीं के बराबर हैं। धर्मेन्द्र जानते थे कि संजीव कुमार भी हेमा पर लट्टू हैं इसलिए वे हेमा के इर्दगिर्द ही रहते थे ताकि संजीव कुमार को हेमा से बात करने का अवसर नहीं मिल सके।
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अमिताभ-जया ने 3 जून 1972 को शादी कर ली। प्रकाश मेहरा की जंजीर रिलीज हुई। अनेक फ्लॉप फिल्में दे चुके बच्चन दम्पत्ति एकाएक सुपरस्टार हो गए। इसका लाभ शोले को मिला। लेकिन फिल्म की शूटिंग के दौरान जया बच्चन प्रेग्नेंट हो गई थी। जिस वजह से शूटिंग में कई बार देरी हुई।
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फिल्म में एक कमाल का सीन है जिसमें जया बच्चन लालटेन जला रही हैं और अमिताभ माउथ आर्गन बजा रहे हैं। बमुश्किल दो मिनट वाले इस सीन को फिल्माने में 20 दिन का समय लगा था।
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शोले की शुरुआत में एक बेहतरीन सीन है जिसमें जय, वीरू और ठाकुर गुंडों से ट्रेन में सफर करते हुए लड़ते हैं। ये सीन 7 सप्ताह की शूटिंग में पूरा हुआ। आज इतने में पूरी फिल्म की शूटिंग हो जाती है। इसे मुंबई-पुणे रेलवे रूट पर पनवेल के निकट फिल्माया गया।
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सांभा का रोल मैकमोहन ने निभाया था। जब उन्हें पता चला कि फिल्म में उनके संवाद नहीं के बराबर हैं तो वे दु:खी हो गए। निर्देशक रमेश सिप्पी ने उन्हें भरोसा दिलाया कि यदि फिल्म चल निकली तो वे बेहद लोकप्रिय हो जाएंगे और ऐसा ही हुआ। माना जाता है कि सांभा का फिल्म में केवल एक ही संवाद है, 'पूरे पचास हजार।' लेकिन एक और डायलाग सांभा का है ‘चिड़ी की रानी तो ठीक है सांभा, वो देख चिड़ी का गुलाम आ रहा है।‘
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गब्बर सिंह और सांभा के संवाद खड़ी बोली में होकर अवधि बोली का टच लिए थे। सलीम ने इस संवादों को अमिताभ और संजीव कुमार के बीच सुनाया, तो अमिताभ गब्बर का रोल करने के इच्छुक लगे। ऐसा ही कुछ संजीव कुमार के मन में भी था।
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ठाकुर के रोल के लिए प्राण के नाम पर विचार किया गया जो सिप्पी फिल्म्स की कई फिल्में पहले कर चुके थे। लेकिन रमेश सिप्पी, संजीव कुमार की प्रतिभा के कायल थे। सीता और गीता में वे संजीव के साथ काम कर चुके थे। अत: परिणाम संजीव के पक्ष में रहा।
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गब्बर का रोल पहले डैनी करने वाले थे, लेकिन वह फिरोज खान की फिल्म धर्मात्मा के लिए डेट दे चुके थे। इस फिल्म की शूटिंग अफगानिस्तान में होनी थी। फिरोज और रमेश सिप्पी दोनों अपने शेड्युल बदलना नहीं चाहते थे। लिहाजा डैनी के हाथ से शोले फिसल गई।
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जय के रोल के लिए शत्रुघ्न सिन्हा का नाम फाइनल था। मगर सलीम-जावेद तथा धर्मेन्द्र ने अमिताभ का नाम सुझाया। जबकि अमिताभ की कई फिल्में फ्लॉप हो रही थी, लेकिन सलीम-जावेद को जंजीर फिल्म की पटकथा पर भरोसा था। उनका मानना था कि जंजीर सफल रहेगी और अमिताभ स्टार बन जाएंगे। हुआ भी ऐसा ही। अमिताभ को जंजीर रिलीज होने के पहले ही साइन किया जा चुका था।
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मुंबई में रमेश सिप्पी, आरडी बर्मन के साथ बैठकर फिल्म के गानों की धुनों की जांच-परख करते रहे। आरडी बर्मन सत्तर के दशक में बेहद व्यस्त और लोकप्रिय थे। उनसे टाइम लेना मुश्किल था। जैसे-तैसे कर पहले गाने की धुन फाइनल हुई- कोई हसीना जब रूठ जाती है तो... ।
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सूरमा भोपाली से पहले कव्वाली कराने का इरादा था। जावेद अख्तर ने कहा कि भोपाल से भांड बुलाए जाएं, तो उसका मजा कुछ और होगा। लिहाजा चार भांड ग्रुप बम्बई आए। उन्होंने पंचम के म्युजिक रूम में गाया- चांद-सा कोई चेहरा ना पहलू में हो, तो चांदनी का मजा नहीं आता। जाम पीकर शराबी ना गिर जाए तो, मैकशी का मजा नहीं आता। इसे बाद में गाया किशोर कुमार, मन्ना डे, भूपिंदर और आनंद बक्षी ने। यह कव्वालीनुमा भांड सांग रिकॉर्ड तो किया गया, मगर फिल्माया नहीं जा सका, क्योंकि शोले की लम्बाई तीन घंटों से ज्यादा होती जा रही थी।
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सूरमा भोपाली का नाम जावेद की उपज है। यह किरदार उन्हें भोपाल निवास के दौरान सूझा था। सूरमा भोपाली का किरदार भोपाल के एक वन अधिकारी की जिंदगी से लिया गया था।
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आज प्रसिद्ध हो चुकी जय-वीरू की जोड़ी, असल में सलीम खान के कॉलेज के समय में दो दोस्त थे।
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ठाकुर बलदेव सिंह का नाम, असल में सलीम खान के ससुर का नाम है। ठाकुर का किरदार एक रिटायर्ड फौजी पर आधारित था, जिसे बाद में पुलिसवाले के किरदार में बदला गया था।
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अमजद खान का नाम गब्बर के लिए फाइनल करने में सलीम खान का हाथ है। हालांकि जावेद अख्तर यह नाम पहले सुझा चुके थे। अमजद के पिता जयंत एक अच्छे एक्टर थे। सलीम साहब का उनके घर आना-जाना था। तब अमजद छोटे थे। एक दिन वह अमजद के पास गए और कहा कि किस्मत अच्छी होगी, तो इस बड़ी फिल्म में काम मिल जाएगा और तुम भी बड़े कलाकार बन जाओगे।
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अमजद खान नमाजी मुसलमान नहीं थे। लेकिन शोले की शूटिंग में जाते हुए उन्होंने कुरान शरीफ सिर पर रख ली। पत्नी शैला को आश्चर्य हुआ। जैसे-तैसे अमजद हवाई जहाज में बैठे। प्लेन उड़ा बम्बई के आकाश में। उड़ते ही उसका हायड्रोलिक सिस्टम फेल हो गया। मजबूरी में प्लेन बम्बई एअरपोर्ट पर उतरा। अमजद घर नहीं गए। एअरपोर्ट पर बैठे रहे। घंटों बाद प्लेन उड़ने को तैयार हुआ, तो सिर्फ पांच यात्री सवार हुए। बाकी सब वापस चले गए। अमजद ने उड़ते हुए आकाश में सोचा कि यदि प्लेन क्रेश हो गया, तो गब्बर का रोल डैनी को मिल जाएगा।
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फिल्म के निर्माता 1947 में जीपी सिप्पी कराची से बम्बई एक शरणार्थी की तरह आए थे। उनके पास शरीर पर पहने शर्ट के अलावा कुछ नहीं था। इस फिल्म ने उन्हें मालामाल कर दिया।
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फिल्म सीता और गीता (1972) की शानदार सफलता की पार्टी जीपी सिप्पी के घर की छत पर दी गई थी। उसमें पिता जीपी और बेटे रमेश सिप्पी ने तय किया था कि इससे भी चार कदम आगे चलकर एक बड़े बजट की भव्य एक्शन फिल्म बनाई जाए। यहीं एक चार लाइन के आईडिया से शोले का बीज जमीन में पड़ा।
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शोले फिल्म की कहानी मार्च 1973 से लिखना आरंभ हुई थी। रोजाना सुबह दस से ग्यारह बजे के बीच सलीम-जावेद तथा रमेश सिप्पी अपने को सिप्पी फिल्म लेखन कक्ष में बंद कर लेते थे। घंटों चर्चा करते थे। इस दौरान चाय-सिगरेट और बीयर की ढेर सारी बोतलें खाली हो जाती थी।
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रमेश सिप्पी शोले को भारत की भव्य फिल्म बनाना चाहते थे। 35 एमएम का फॉर्मेट फिल्म को महान बनाने के लिए छोटा था। लिहाजा तय किया गया कि इसे 70 एमएम और स्टीरियोफोनिक साउंड में बनाया जाए। लेकिन विदेशों से कैमरे मंगाकर शूटिंग करने से शोले का बजट बढ़ जाता। लिहाजा अधिकांश शूटिंग 35 एमएम में कर 70 एमएम में ब्लोअप किया गया।
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रमेश सिप्पी को जैसे ही लोकेशन की खबर मिली, वह सिनेमाटोग्राफर द्वारका दिवेचा के साथ हवाई जहाज से आ गए। बड़ी-बड़ी बिल्डिंग साइज की चट्टानें। बीहड़। सूखे पेड़। उबड़-खाबड़ रास्ते। और क्या चाहिए था दिवेचा को। मनपसंद लोकेशन सामने मौजूद थी। नाम था- रामनगरम्। शोले फिल्म में गब्बर की गुफा और ठाकुर का घर मीलों दूर दिखाया गया है। लेकिन सचमुच में दोनों पास-पास थे। रामनगरम् को फिल्म के सेट के मुताबिक मुंबई के तीस और स्थानीय सत्तर लोगों ने रात-दिन मेहनत कर पूरा गांव बसा दिया।
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शोले फिल्म ने पांच साल लगातार बंबई के सिनेमाघर मिनर्वा में चल कर एक कीर्त्तिमान कायम किया था। इसके पहले बॉम्बे टॉकीज की फिल्म 'किस्मत' (1943) कलकत्ता में लगातार साढ़े तीन साल तक चली थी। शोले का रिकॉर्ड दिलवाले दुल्हनियां ने तोड़ा।
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15 अगस्त 1975 को रिलीज हुई शोले ने भारत में 60 जगह गोल्डन जुबली (50 सप्ताह) और 100 से ज्यादा सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली (25 सप्ताह) मनाई थी। 48) तीन से चार करोड़ रुपये में बनी शोले का मुंबई स्थित मिनर्वा सिनेमा में प्रीमियर हुआ था।
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शोले जब रिलीज हुई थी तो फिल्म समीक्षकों ने इसकी काफी आलोचना की थी, लेकिन जब यह फिल्म ब्लॉकबस्टर हो गई तो अचानक ज्यादातरों के सुर बदल गए। इसे क्लासिक और कल्ट मूवी कहा जाने लगा। शोले के बाद ही पटकथा लेखकों (स्क्रिप्टराइटर) को बॉलीवुड में बेहतर सम्मान और पैसा मिलना शुरू हुआ।
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1999 में बीबीसी ने शोले को 'फिल्म ऑफ द मिलेनियम' कहा। ये खिताब ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट के एक पोल के आधार पर दिया गया। फिल्म की लाइनें एक चलन की तरह ट्रक और ऑटोरिक्शा पर देखी जाती हैं।
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अपनी किताब 'शोले: द मेकिंग ऑफ क्लासिक' में अनुपमा चोपड़ा ने शोले को हिन्दी सिनेमा का सोना कहा है। 'शोले: द मेकिंग ऑफ क्लासिक' में ही शेखर कपूर ने कहा है कि शोले जैसी फिल्म भारत में कभी नहीं बनी। इस फिल्म के बाद हिन्दी सिनेमा के इतिहास को दो भागों में विभाजित कीजिए।
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दर्शकों की अदालत में ब्लॉकबस्टर साबित हुई ‘शोले’ को केवल एक फिल्मफेअर पुरस्कार (बेस्ट एडिटिंग) मिला। कैमरामैन द्वारका दिवेजा के काम से खुश होकर ‘शोले’ के निर्माता ने उन्हें एक फिएट कार गिफ्ट में दी थी।
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शोले के असली अंत में ठाकुर को गब्बर को मारते हुए दिखाया गया था। सेंसर बोर्ड के दखल के बाद फिल्म का अंत बदला गया क्योंकि गब्बर को मारते हुए दिखाना काफी हिंसक था। 15 साल तक फिल्म का एडिटेड वर्जन ही देखा गया। 1990 में ओरिजिनल वर्जन उपलब्ध हुआ।
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शोले की जितनी बार नकल की गई और इस पर जितनी स्टैंडअप कॉमेडी बनी, बॉलीवुड की किसी दूसरी फिल्म पर इतने नहीं बने। शोले फिल्म ने बाजार में कई तरह की चीजों को बेचने में कामयाबी हासिल की थी। ग्लुकोज बिस्किट्स से लेकर ग्राइप वॉटर तक। सन् 2000 में पॉप स्टार बाली ब्रह्मभट्ट ने रि-मिक्स अलबम बनाया था- शोले 2000। उसे शीर्षक दिया था- 'द हथौड़ा मिक्स'। यह शोले के ठाकुर का संवाद है, जो वीरू तथा जय को कहा गया था- लोहा गरम है, मार दो हथौड़ा।
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हल ही में शोले के किरदार गब्बर को नाम पर फिल्म 'गब्बर इज बैक' बनी है।
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शोले 3-डी में भी बन चुकी है। शोले का बजट था तीन करोड़ और 3-डी वर्जन का 25 करोड़ था। शोले 3-डी तीन जनवरी 2014 को रिलीज हुई।
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शोले के फेसबुक पेज को 10 लाख से ज्यादा लाइक मिले हैं।
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रमेश सिप्पी से पहले दो प्रोड्यूसर और डायरक्टरों की टीम इस आइडिया को रिजेक्ट कर चुकी थी। लेकिन सिप्पी ने उसी से इतिहास रच दिया कुछ नयापन लाकर जैसे-शोले में गब्बर सिंह को मॉडर्न डकैत के रूप में दिखाया गया, जो सैनिक पोशाक पहनता है। इसके पहले दिलीप कुमार की गंगा-जमुना या सुनील दत्त की मुझे जीने दो फिल्म में डाकू धोती-कुर्त्ता में आए थे।